0
0
Share on facebook
Share on twitter
Share on telegram
Share on whatsapp

आरती कुंजबिहारी की, गिरधर कृष्ण मुरारी की।
गले में बैजन्ती माला, बजाये मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झल काला, नन्द के आनन्द नन्द लाला।
ॐ नैनन बीच, बसहि उर बीच, सुरतिया रूप उजारी की।
गिरधर कृष्ण मुरारी की, आरती कुंजबिहारी की।
कनकमय मोर मुकुट विलसे, देवता दर्शन को तरसे।
गगन से सुमन बहुत बरसे बजत मुँह चंग और मृदंगग्वालिनी संग।
लाज रख गोप कुमारी की, गिरधर कृष्ण मुरारी की,
आरती कुंजबिहारी की।
जहां ते प्रकटी हैं गंगा, कलुष कलि हरनी श्रीगंगा।।
धरी शिव जटा के बीच, राधिका गौर श्याम पटछोर की।
छवि निरखें बनवारी की, गिरधर कृष्ण मुरारी की।
आरती कुंजबिहारी की।
चहुँ दिखि गोप ग्वाल धेनु, बाज रही जमुना तट बेनु।।
हँसत मुख मन्द, वरन सुख कन्द वृन्दावन चन्द, टेर सुनि
लेउ भिखारी की। गिरधर कृष्ण मुरारी की,आरती कुंजबिहारी ।

 

Sharing Is Karma

Share on facebook
Share
Share on twitter
Tweet
Share on linkedin
LinkedIn
Share on telegram
Telegram
Share on whatsapp
WhatsApp

More Aarti's

Collectionब्रह्मसंग्रह

!! भारतीय ज्ञान और परंपरा का एक प्रगतिशील संग्रहालय  !!

Articlesब्रह्मलेख

Namaste Vanakkam Sat Srī Akāl Namaskārām Khurumjari Parnām Tashi Delek Khurumjari 

Join The Change