अब मैं जानी देह बुढ़ानी ।
सीस, पाउँ, कर कह्यौ न मानत, तन की दसा सिरानी।
आन कहत, आनै कहि आवत, नैन-नाक बहै पानी।
मिटि गई चमक-दमक अँग-अँग की, मति अरु दृष्टि हिरानी।
नाहिं रही कछु सुधि तन-मन की, भई जु बात बिरानी।
सूरदास अब होत बिगूचनि, भजि लै सारँगपानी

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अब मैं जानी देह बुढ़ानी

अब मैं जानी देह बुढ़ानी । सीस, पाउँ, कर कह्यौ न मानत, तन की दसा सिरानी। आन कहत, आनै कहि आवत, नैन-नाक बहै पानी। मिटि गई चमक-दमक अँग-अँग की, मति अरु दृष्टि हिरानी। नाहिं रही कछु सुधि तन-मन की, भई जु बात बिरानी। सूरदास अब होत बिगूचनि, भजि लै सारँगपानी

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