अबिगत गति कछु कहति न आवै

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अबिगत गति कछु कहति न आवै।
ज्यों गूंगो मीठे फल की रस अन्तर्गत ही भावै॥
परम स्वादु सबहीं जु निरन्तर अमित तोष उपजावै।
मन बानी कों अगम अगोचर सो जाने जो पावै॥
रूप रैख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब मन चकृत धावै।
सब बिधि अगम बिचारहिं, तातों सूर सगुन लीला पद गावै॥

अबिगत गति कछु कहति न आवै।
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Bhajanब्रह्मभजन

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पग घूँघरू बाँध मीरा नाची रे।

उधो, मन न भए दस बीस

काहू जोगीकी नजर लागी है मेरो कुंवर

अबिगत गति कछु कहति न आवै।

नंद दुवारे एक जोगी आयो

उधो, मन न भए दस बीस

औरन सों खेले धमार

अबिगत गति कछु कहति न आवै।

कनक रति मनि पालनौ, गढ्यो काम सुतहार

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नैना निपट बंकट छबि अटके

उधो, मन न भए दस बीस

नाथ, अनाथन की सुधि लीजै।

सोभित कर नवनीत लिए

कनक रति मनि पालनौ, गढ्यो काम सुतहार

सोभित कर नवनीत लिए

नारी दूरत बयाना रतनारे

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हे भोले शंकर पधारो, बैठे छुप के कहाँ

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कीजो प्रीत खरी

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