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Bhajan

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मेरो कान्ह कमलदललोचन

मेरो कान्ह कमलदललोचन। अब की बेर बहुरि फिरि आवहु, कहा लगे जिय सोचन॥ यह लालसा होति हिय मेरे, बैठी देखति रैहौं॥ गाइ चरावन कान्ह कुंवर

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संदेसो दैवकी सों कहियौ

संदेसो दैवकी सों कहियौ। `हौं तौ धाय तिहारे सुत की, मया करति नित रहियौ॥ जदपि टेव जानति तुम उनकी, तऊ मोहिं कहि आवे। प्रातहिं उठत

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मुरली गति बिपरीत कराई

मुरली गति बिपरीत कराई। तिहुं भुवन भरि नाद समान्यौ राधारमन बजाई॥ बछरा थन नाहीं मुख परसत, चरत नहीं तृन धेनु। जमुना उलटी धार चली बहि,

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वृच्छन से मत ले

वृच्छन से मत ले, मन तू वृच्छन से मत ले। काटे वाको क्रोध न करहीं, सिंचत न करहीं नेह॥ धूप सहत अपने सिर ऊपर, और

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नटवर वेष काछे स्याम

नटवर वेष काछे स्याम। पदकमल नख-इन्दु सोभा, ध्यान पूरनकाम॥ जानु जंघ सुघट निकाई, नाहिं रंभा तूल। पीतपट काछनी मानहुं जलज-केसरि झूल॥ कनक-छुद्वावली पंगति नाभि कटि

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नैन भये बोहित के काग

नैन भये बोहित के काग। उड़ि उड़ि जात पार नहिं पावैं, फिरि आवत इहिं लाग॥ ऐसी दसा भई री इनकी, अब लागे पछितान। मो बरजत

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जौ बिधिना अपबस करि पाऊं

जौ बिधिना अपबस करि पाऊं। तौ सखि कह्यौ हौइ कछु तेरो, अपनी साध पुराऊं॥ लोचन रोम-रोम प्रति मांगों पुनि-पुनि त्रास दिखाऊं। इकटक रहैं पलक नहिं

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जसुमति दौरि लिये हरि कनियां

जसुमति दौरि लिये हरि कनियां। “आजु गयौ मेरौ गाय चरावन, हौं बलि जाउं निछनियां॥ मो कारन कचू आन्यौ नाहीं बन फल तोरि नन्हैया। तुमहिं मिलैं

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आई छाक बुलाये स्याम

आई छाक बुलाये स्याम। यह सुनि सखा सभै जुरि आये, सुबल सुदामा अरु श्रीदाम॥ कमलपत्र दौना पलास के सब आगे धरि परसत जात। ग्वालमंडली मध्यस्यामधन

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मेरी माई, हठी बालगोबिन्दा

मेरी माई, हठी बालगोबिन्दा। अपने कर गहि गगन बतावत, खेलन कों मांगै चंदा॥ बासन के जल धर्‌यौ, जसोदा हरि कों आनि दिखावै। रुदन करत ढ़ूढ़ै

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खेलत नंद-आंगन गोविन्द

खेलत नंद-आंगन गोविन्द। निरखि निरखि जसुमति सुख पावति बदन मनोहर चंद॥ कटि किंकिनी, कंठमनि की द्युति, लट मुकुता भरि माल। परम सुदेस कंठ के हरि

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भजु मन चरन संकट-हरन

भजु मन चरन संकट-हरन। सनक, संकर ध्यान लावत, सहज असरन-सरन॥ सेस, सारद, कहैं नारद संत-चिन्तन चरन। पद-पराग-प्रताप दुर्लभ, रमा के हित-करन॥ परसि गंगा भई पावन,

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मन तोसों कोटिक बार कहीं

मन तोसों कोटिक बार कहीं। समुझि न चरन गहे गोविन्द के, उर अघ-सूल सही॥ सुमिरन ध्यान कथा हरिजू की, यह एकौ न रही। लोभी लंपट

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जापर दीनानाथ ढरै

जापर दीनानाथ ढरै। सोई कुलीन, बड़ो सुन्दर सिइ, जिहिं पर कृपा करै॥ राजा कौन बड़ो रावन तें, गर्वहिं गर्व गरै। कौन विभीषन रंक निसाचर, हरि

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मो सम कौन कुटिल खल कामी

मो सम कौन कुटिल खल कामी। जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नोनहरामी॥ भरि भरि उदर विषय कों धावौं, जैसे सूकर ग्रामी। हरिजन छांड़ि हरी-विमुखन

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रे मन, राम सों करि हेत

रे मन, राम सों करि हेत। हरिभजन की बारि करिलै, उबरै तेरो खेत॥ मन सुवा, तन पींजरा, तिहि मांझ राखौ चेत। काल फिरत बिलार तनु

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है हरि नाम कौ आधार

है हरि नाम कौ आधार। और इहिं कलिकाल नाहिंन रह्यौ बिधि-ब्यौहार॥ नारदादि सुकादि संकर कियौ यहै विचार। सकल स्रुति दधि मथत पायौ इतौई घृत-सार॥ दसहुं

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है हरि नाम कौ आधार

है हरि नाम कौ आधार। और इहिं कलिकाल नाहिंन रह्यौ बिधि-ब्यौहार॥ नारदादि सुकादि संकर कियौ यहै विचार। सकल स्रुति दधि मथत पायौ इतौई घृत-सार॥ दसहुं

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कहावत ऐसे दानी दानि

कहावत ऐसे दानी दानि। चारि पदारथ दिये सुदामहिं, अरु गुरु को सुत आनि॥ रावन के दस मस्तक छेद, सर हति सारंगपानि। लंका राज बिभीषन दीनों

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धोखैं ही धोखैं डहकायौ

धोखैं ही धोखैं डहकायौ। समुझी न परी विषय रस गीध्यौ, हरि हीरा घर मांझ गंवायौं॥ क्यौं कुरंग जल देखि अवनि कौ, प्यास न गई, दसौं

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तुम्हारी भक्ति हमारे प्रान

तुम्हारी भक्ति हमारे प्रान। छूटि गये कैसे जन जीवै, ज्यौं प्रानी बिनु प्रान॥ जैसे नाद-मगन बन सारंग, बधै बधिक तनु बान। ज्यौं चितवै ससि ओर

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जौलौ सत्य स्वरूप न सूझत

जौलौ सत्य स्वरूप न सूझत। तौलौ मनु मनि कंठ बिसारैं, फिरतु सकल बन बूझत॥ अपनो ही मुख मलिन मंदमति, देखत दरपन माहीं। ता कालिमा मेटिबै

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सरन गये को को न उबार्‌यो

सरन गये को को न उबार्‌यो। जब जब भीर परीं संतति पै, चक्र सुदरसन तहां संभार्‌यौ। महाप्रसाद भयौ अंबरीष कों, दुरवासा को क्रोध निवार्‌यो॥ ग्वालिन

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माधवजू, जो जन तैं बिगरै

माधवजू, जो जन तैं बिगरै। तउ कृपाल करुनामय केसव, प्रभु नहिं जीय धर॥ जैसें जननि जठर अन्तरगत, सुत अपराध करै। तोऊ जतन करै अरु पोषे,

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सोइ रसना जो हरिगुन गावै

सोइ रसना जो हरिगुन गावै। नैननि की छवि यहै चतुरता जो मुकुंद मकरंदहिं धावै॥ निर्मल चित तौ सोई सांचो कृष्ण बिना जिहिं और न भावै।

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सोइ रसना जो हरिगुन गावै

सोइ रसना जो हरिगुन गावै। नैननि की छवि यहै चतुरता जो मुकुंद मकरंदहिं धावै॥ निर्मल चित तौ सोई सांचो कृष्ण बिना जिहिं और न भावै।

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आछो गात अकारथ गार्‌यो

आछो गात अकारथ गार्‌यो। करी न प्रीति कमललोचन सों, जनम जनम ज्यों हार्‌यो॥ निसदिन विषय बिलासिन बिलसत फूटि गईं तुअ चार्‌यो। अब लाग्यो पछितान पाय

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कब तुम मोसो पतित उधारो

कब तुम मोसो पतित उधारो। पतितनि में विख्यात पतित हौं पावन नाम तिहारो॥ बड़े पतित पासंगहु नाहीं, अजमिल कौन बिचारो। भाजै नरक नाम सुनि मेरो,

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अब हों नाच्यौ बहुत गोपाल

अब हों नाच्यौ बहुत गोपाल। काम क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ विषय की माल॥ महामोह के नूपुर बाजत, निन्दा सब्द रसाल। भरम भर्‌यौ मन भयौ

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अब कै माधव, मोहिं उधारि

अब कै माधव, मोहिं उधारि। मगन हौं भव अम्बुनिधि में, कृपासिन्धु मुरारि॥ नीर अति गंभीर माया, लोभ लहरि तरंग। लियें जात अगाध जल में गहे

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प्रभु, हौं सब पतितन कौ राजा

प्रभु, हौं सब पतितन कौ राजा। परनिंदा मुख पूरि रह्यौ जग, यह निसान नित बाजा॥ तृस्ना देसरु सुभट मनोरथ, इंद्रिय खड्ग हमारे। मंत्री काम कुमत

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प्रभु, मेरे औगुन न विचारौ

प्रभु, मेरे औगुन न विचारौ। धरि जिय लाज सरन आये की रबि-सुत-त्रास निबारौ॥ जो गिरिपति मसि धोरि उदधि में लै सुरतरू निज हाथ। ममकृत दोष

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अबिगत गति कछु कहति न आवै

अबिगत गति कछु कहति न आवै। ज्यों गूंगो मीठे फल की रस अन्तर्गत ही भावै॥ परम स्वादु सबहीं जु निरन्तर अमित तोष उपजावै। मन बानी

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चरन कमल बंदौ हरि राई

चरन कमल बंदौ हरि राई। जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, आंधर कों सब कछु दरसाई॥ बहिरो सुनै, मूक पुनि बोलै, रंक चले सिर छत्र धराई।

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प्रीति करि काहू सुख न लह्यो

प्रीति करि काहू सुख न लह्यो। प्रीति पतंग करी दीपक सों आपै प्रान दह्यो।। अलिसुत प्रीति करी जलसुत सों¸ संपति हाथ गह्यो। सारंग प्रीति करी

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अंखियां हरि–दरसन की प्यासी

अंखियां हरि–दरसन की प्यासी। देख्यौ चाहति कमलनैन कौ¸ निसि–दिन रहति उदासी।। आए ऊधै फिरि गए आंगन¸ डारि गए गर फांसी। केसरि तिलक मोतिन की माला¸

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मधुकर! स्याम हमारे चोर

मधुकर! स्याम हमारे चोर। मन हरि लियो सांवरी सूरत¸ चितै नयन की कोर।। पकरयो तेहि हिरदय उर–अंतर प्रेम–प्रीत के जोर। गए छुड़ाय छोरि सब बंधन

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चरन कमल बंदौ हरिराई

चरन कमल बंदौ हरिराई । जाकी कृपा पंगु गिरि लंघे,अंधे को सब कछु दरसाई ॥१॥ बहरो सुने मूक पुनि बोले,रंक चले सिर छत्र धराई ।

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निसिदिन बरसत नैन हमारे

निसिदिन बरसत नैन हमारे। सदा रहत पावस ऋतु हम पर, जबते स्याम सिधारे।। अंजन थिर न रहत अँखियन में, कर कपोल भये कारे। कंचुकि-पट सूखत

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ऊधौ, कर्मन की गति न्यारी

ऊधौ, कर्मन की गति न्यारी। सब नदियाँ जल भरि-भरि रहियाँ सागर केहि बिध खारी॥ उज्ज्वल पंख दिये बगुला को कोयल केहि गुन कारी॥ सुन्दर नयन

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भोरहि सहचरि कातर दिठि

भोरहि सहचरि कातर दिठि हेरि छल छल लोचन पानि । अनुखन राधा राधा रटइत आधा आधा बानि ।। राधा सयँ जब पनितहि माधव, माधव सयँ

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हरि पालनैं झुलावै

जसोदा हरि पालनैं झुलावै। हलरावै दुलरावै मल्हावै जोइ सोइ कछु गावै॥ मेरे लाल को आउ निंदरिया काहें न आनि सुवावै। तू काहै नहिं बेगहिं आवै

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भाव भगति है जाकें

भाव भगति है जाकें रास रस लीला गाइ सुनाऊं। यह जस कहै सुनै मुख स्त्रवननि तिहि चरनन सिर नाऊं॥ कहा कहौं बक्ता स्त्रोता फल इक

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प्रीति करि काहु सुख न लह्यो

प्रीति करि काहु सुख न लह्यो। प्रीति पतंग करी दीपक सों, आपै प्रान दह्यो॥ अलिसुत प्रीति करी जलसुत सों, संपति हाथ गह्यो। सारँग प्रीति करी

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