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Bhajan

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हरि हैं राजनीति पढि आए

हरि हैं राजनीति पढि आए. समुझी बात कहत मधुकर के,समाचार सब पाए. इक अति चतुर हुतै पहिलें हीं,अब गुरुग्रंथ पढाए. बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी

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हमारे हरि हारिल की लकरी

हमारे हरि हारिल की लकरी. मन क्रम वचन नंद-नंदन उर, यह दृढ करि पकरी. जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि,कान्ह-कान्ह जकरी. सुनत जोग लागत है ऐसो, ज्यौं

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ऊधौ,तुम हो अति बड़भागी

ऊधौ,तुम हो अति बड़भागी अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी पुरइनि पात रहत जल भीतर,ता रस देह न दागी ज्यों जल मांह तेल

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आजु मैं गाई चरावन जैहों

आजु मैं गाई चरावन जैहों बृंदाबन के भाँति भाँति फल, अपने कर मैं खैहौं। ऎसी बात कहौ जनि बारे, देखौ अपनी भांति। तनक तनक पग

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सोभित कर नवनीत लिए

सोभित कर नवनीत लिए। घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित मुख दधि लेप किए॥ चारु कपोल लोल लोचन गोरोचन तिलक दिए। लट लटकनि मनु मत्त मधुप

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ऐसी प्रीति की बलि जाऊं

ऐसी प्रीति की बलि जाऊं। सिंहासन तजि चले मिलन कौं, सुनत सुदामा नाउं। कर जोरे हरि विप्र जानि कै, हित करि चरन पखारे। अंकमाल दै

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आजु हौं एक-एक करि टरिहौं

आजु हौं एक-एक करि टरिहौं। के तुमहीं के हमहीं, माधौ, अपुन भरोसे लरिहौं। हौं तौ पतित सात पीढिन कौ, पतिते ह्वै निस्तरिहौं। अब हौं उघरि

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मन धन-धाम धरे

मन धन-धाम धरे मोसौं पतित न और हरे। जानत हौ प्रभु अंतरजामी, जे मैं कर्म करे॥ ऐसौं अंध, अधम, अबिबेकी, खोटनि करत खरे। बिषई भजे,

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दियौ अभय पद ठाऊँ

दियौ अभय पद ठाऊँ तुम तजि और कौन पै जाउँ। काकैं द्वार जाइ सिर नाऊँ, पर हथ कहाँ बिकाउँ॥ ऐसौ को दाता है समरथ, जाके

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आनि सँजोग परै

आनि सँजोग परै भावी काहू सौं न टरै। कहँ वह राहु, कहाँ वे रबि-ससि, आनि सँजोग परै॥ मुनि वसिष्ट पंडित अति ज्ञानी, रचि-पचि लगन धरै।

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अजहूँ चेति अचेत

अजहूँ चेति अचेत सबै दिन गए विषय के हेत। तीनौं पन ऐसैं हीं खोए, केश भए सिर सेत॥ आँखिनि अंध, स्त्रवन नहिं सुनियत, थाके चरन

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रे मन मूरख, जनम गँवायौ

रे मन मूरख, जनम गँवायौ। करि अभिमान विषय-रस गीध्यौ, स्याम सरन नहिं आयौ॥ यह संसार सुवा-सेमर ज्यौं, सुन्दर देखि लुभायौ। चाखन लाग्यौ रुई गई उडि़,

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जनम अकारथ खोइसि

जनम अकारथ खोइसि रे मन, जनम अकारथ खोइसि। हरि की भक्ति न कबहूँ कीन्हीं, उदर भरे परि सोइसि॥ निसि-दिन फिरत रहत मुँह बाए, अहमिति जनम

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अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल

अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल। काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ बिषय की माल॥ महामोह के नूपुर बाजत, निंदा सबद रसाल। भ्रम-भोयौ मन भयौ, पखावज, चलत

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रतन-सौं जनम गँवायौ

रतन-सौं जनम गँवायौ हरि बिनु कोऊ काम न आयौ। इहि माया झूठी प्रपंच लगि, रतन-सौं जनम गँवायौ॥ कंचन कलस, बिचित्र चित्र करि, रचि-पचि भवन बनायौ।

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