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Page 4

Bhajan

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बदन मनोहर गात

बदन मनोहर गात सखी री कौन तुम्हारे जात। राजिव नैन धनुष कर लीन्हे बदन मनोहर गात॥ लज्जित होहिं पुरबधू पूछैं अंग अंग मुसकात। अति मृदु

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कहां लौं बरनौं सुंदरताई

कहां लौं बरनौं सुंदरताई। खेलत कुंवर कनक-आंगन मैं नैन निरखि छबि पाई॥ कुलही लसति सिर स्याम सुंदर कैं बहु बिधि सुरंग बनाई। मानौ नव धन

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माधव कत तोर करब बड़ाई

माधव कत तोर करब बड़ाई। उपमा करब तोहर ककरा सों कहितहुँ अधिक लजाई॥ अर्थात् भगवान् की तुलना किसी से संभव नहीं है। पायो परम पदु

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सबसे ऊँची प्रेम सगाई

सबसे ऊँची प्रेम सगाई। दुर्योधन की मेवा त्यागी, साग विदुर घर पाई॥ जूठे फल सबरी के खाये बहुबिधि प्रेम लगाई॥ प्रेम के बस नृप सेवा

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उपमा हरि तनु देखि लजानी

उपमा हरि तनु देखि लजानी। कोउ जल मैं कोउ बननि रहीं दुरि कोउ कोउ गगन समानी॥ मुख निरखत ससि गयौ अंबर कौं तडि़त दसन-छबि हेरि।

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जागिए ब्रजराज कुंवर

जागिए ब्रजराज कुंवर कमल-कुसुम फूले। कुमुद -बृंद संकुचित भए भृंग लता भूले॥ तमचुर खग करत रोर बोलत बनराई। रांभति गो खरिकनि मैं बछरा हित धाई॥

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हम भगतनि के भगत हमारे

हम भगतनि के भगत हमारे। सुनि अर्जुन परतिग्या मेरी यह ब्रत टरत न टारे॥ भगतनि काज लाज हिय धरि कै पाइ पियादे धाऊं। जहां जहां

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मेटि सकै नहिं कोइ

मेटि सकै नहिं कोइ करें गोपाल के सब होइ। जो अपनौ पुरषारथ मानै अति झूठौ है सोइ॥ साधन मंत्र जंत्र उद्यम बल ये सब डारौं

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बृथा सु जन्म गंवैहैं

बृथा सु जन्म गंवैहैं जा दिन मन पंछी उडि़ जैहैं। ता दिन तेरे तनु तरवर के सबै पात झरि जैहैं॥ या देही को गरब न

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सकल सुख के कारन

सकल सुख के कारन भजि मन नंद नंदन चरन। परम पंकज अति मनोहर सकल सुख के करन॥ सनक संकर ध्यान धारत निगम आगम बरन। सेस

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राखी बांधत जसोदा मैया

राखी बांधत जसोदा मैया । विविध सिंगार किये पटभूषण, पुनि पुनि लेत बलैया ॥ हाथन लीये थार मुदित मन, कुमकुम अक्षत मांझ धरैया। तिलक करत

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मोहन केसे हो तुम दानी

मोहन केसे हो तुम दानी। सूधे रहो गहो अपनी पति तुमारे जिय की जानी॥ हम गूजरि गमारि नारि हे तुम हो सारंगपानी। मटुकी लई उतारि

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रानी तेरो चिरजीयो गोपाल

रानी तेरो चिरजीयो गोपाल । बेगिबडो बढि होय विरध लट, महरि मनोहर बाल॥ उपजि पर्यो यह कूंखि भाग्य बल, समुद्र सीप जैसे लाल। सब गोकुल

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हरि हरि हरि सुमिरन करौ

हरि हरि हरि सुमिरन करौ। हरि चरनारबिंद उर धरौं॥ हरि की कथा होइ जब जहां। गंगाहू चलि आवै तहां॥ जमुना सिन्धु सरस्वति आवै। गोदावरी विलंब

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वा पटपीत की फहरानि

वा पटपीत की फहरानि। कर धरि चक्र चरन की धावनि, नहिं बिसरति वह बानि॥ रथ तें उतरि अवनि आतुर ह्वै, कचरज की लपटानि। मानौं सिंह

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मो परतिग्या रहै कि जाउ

मो परतिग्या रहै कि जाउ। इत पारथ कोप्यौ है हम पै, उत भीषम भटराउ॥ रथ तै उतरि चक्र धरि कर प्रभु सुभटहिं सन्मुख आयौ। ज्यों

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जो पै हरिहिं न शस्त्र गहाऊं

जो पै हरिहिं न शस्त्र गहाऊं। तौ लाजौं गंगा जननी कौं सांतनु-सुतन कहाऊं॥ स्यंदन खंडि महारथ खंडौं, कपिध्वज सहित डुलाऊं। इती न करौं सपथ मोहिं

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हरि, तुम क्यों न हमारैं आये

हरि, तुम क्यों न हमारैं आये। षटरस व्यंजन छाड़ि रसौई साग बिदुर घर खाये॥ ताकी कुटिया में तुम बैठे, कौन बड़प्पन पायौ। जाति पांति कुलहू

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ऐसैं मोहिं और कौन पहिंचानै

ऐसैं मोहिं और कौन पहिंचानै। सुनि री सुंदरि, दीनबंधु बिनु कौन मिताई मानै॥ कहं हौं कृपन कुचील कुदरसन, कहं जदुनाथ गुसाईं। भैंट्यौ हृदय लगाइ प्रेम

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