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Bhajan

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नाथ, अनाथन की सुधि लीजै।

नाथ, अनाथन की सुधि लीजै। गोपी गाइ ग्वाल गौ-सुत सब दीन मलीन दिंनहिं दिन छीज॥ नैन नीर-धारा बाढ़ी अति ब्रज किन कर गहि लीजै। इतनी

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नाथ, अनाथन की सुधि लीजै

नाथ, अनाथन की सुधि लीजै। गोपी गाइ ग्वाल गौ-सुत सब दीन मलीन दिंनहिं दिन छीज॥ नैन नीर-धारा बाढ़ी अति ब्रज किन कर गहि लीजै। इतनी

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अब या तनुहिं राखि कहा कीजै

अब या तनुहिं राखि कहा कीजै। सुनि री सखी, स्यामसुंदर बिनु बांटि विषम विष पीजै॥ के गिरिए गिरि चढ़ि सुनि सजनी, सीस संकरहिं दीजै। के

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तबतें बहुरि न कोऊ आयौ

तबतें बहुरि न कोऊ आयौ। वहै जु एक बेर ऊधो सों कछुक संदेसों पायौ॥ छिन-छिन सुरति करत जदुपति की परत न मन समुझायौ। गोकुलनाथ हमारे

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कहां लौं कहिए ब्रज की बात

कहां लौं कहिए ब्रज की बात। सुनहु स्याम, तुम बिनु उन लोगनि जैसें दिवस बिहात॥ गोपी गाइ ग्वाल गोसुत वै मलिन बदन कृसगात। परमदीन जनु

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कहियौ जसुमति की आसीस

कहियौ जसुमति की आसीस। जहां रहौ तहं नंदलाडिले, जीवौ कोटि बरीस॥ मुरली दई, दौहिनी घृत भरि, ऊधो धरि लई सीस। इह घृत तौ उनहीं सुरभिन

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कहियौ जसुमति की आसीस

कहियौ जसुमति की आसीस। जहां रहौ तहं नंदलाडिले, जीवौ कोटि बरीस॥ मुरली दई, दौहिनी घृत भरि, ऊधो धरि लई सीस। इह घृत तौ उनहीं सुरभिन

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निरगुन कौन देश कौ बासी

निरगुन कौन देश कौ बासी। मधुकर, कहि समुझाइ, सौंह दै बूझति सांच न हांसी॥ को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि को दासी। कैसो

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ऊधो, मन माने की बात

ऊधो, मन माने की बात। दाख छुहारो छांड़ि अमृतफल, बिषकीरा बिष खात॥ जो चकोर कों देइ कपूर कोउ, तजि अंगार अघात। मधुप करत घर कोरि

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ऊधो, हम लायक सिख दीजै

ऊधो, हम लायक सिख दीजै। यह उपदेस अगिनि तै तातो, कहो कौन बिधि कीजै॥ तुमहीं कहौ, इहां इतननि में सीखनहारी को है। जोगी जती रहित

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उधो, मन न भए दस बीस

उधो, मन न भए दस बीस। एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस॥ सिथिल भईं सबहीं माधौ बिनु जथा देह बिनु सीस। स्वासा

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ऊधो, होहु इहां तैं न्यारे

ऊधो, होहु इहां तैं न्यारे। तुमहिं देखि तन अधिक तपत है, अरु नयननि के तारे॥ अपनो जोग सैंति किन राखत, इहां देत कत डारे। तुम्हरे

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जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै

जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै। यह ब्योपार तिहारो ऊधौ, ऐसोई फिरि जैहै॥ यह जापे लै आये हौ मधुकर, ताके उर न समैहै। दाख छांडि कैं

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नीके रहियौ जसुमति मैया

नीके रहियौ जसुमति मैया। आवहिंगे दिन चारि पांच में हम हलधर दोउ भैया॥ जा दिन तें हम तुम तें बिछुरै, कह्यौ न कोउ `कन्हैया’। कबहुं

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कहियौ, नंद कठोर भये

कहियौ, नंद कठोर भये। हम दोउ बीरैं डारि परघरै, मानो थाती सौंपि गये॥ तनक-तनक तैं पालि बड़े किये, बहुतै सुख दिखराये। गो चारन कों चालत

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मेरो कान्ह कमलदललोचन

मेरो कान्ह कमलदललोचन। अब की बेर बहुरि फिरि आवहु, कहा लगे जिय सोचन॥ यह लालसा होति हिय मेरे, बैठी देखति रैहौं॥ गाइ चरावन कान्ह कुंवर

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संदेसो दैवकी सों कहियौ

संदेसो दैवकी सों कहियौ। `हौं तौ धाय तिहारे सुत की, मया करति नित रहियौ॥ जदपि टेव जानति तुम उनकी, तऊ मोहिं कहि आवे। प्रातहिं उठत

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मुरली गति बिपरीत कराई

मुरली गति बिपरीत कराई। तिहुं भुवन भरि नाद समान्यौ राधारमन बजाई॥ बछरा थन नाहीं मुख परसत, चरत नहीं तृन धेनु। जमुना उलटी धार चली बहि,

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