मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना

मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना

Share on facebook
Share on twitter
Share on telegram
Share on whatsapp
Play Video

ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।
जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफन की तरह सफेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिल-खिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।
ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनन्दन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,
किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छांव में पलभर पलक ही झपका सकता है।

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफि नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बंटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।
जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

जरूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूंट सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।
भीड़ में खो जाना,
यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।
धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इन्सानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,
किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई कांटा न चुभे,
कोई कलि न खिले।

न वसंत हो, न पतझड़,
हों सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलापन का सन्नाटा।

मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
गैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।

Share the Goodness

Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on telegram
Share on whatsapp
Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn
Share on telegram
Telegram
Share on whatsapp
WhatsApp

kavitaकविता

Atal Bihari Vajpayee

मैं अखिल विश्व का गुरु महान

मैं अखिल विश्व का गुरू महान, देता विद्या का अमर दान, मैंने दिखलाया मुक्ति मार्ग मैंने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान। मेरे वेदों का ज्ञान अमर, मेरे

Read More »
Atal Bihari Vajpayee

राह कौन सी जाऊँ मैं ?

चौराहे पर लुटता चीर प्यादे से पिट गया वजीर चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ? राह कौन सी जाऊँ मैं? सपना जन्मा और

Read More »
Atal Bihari Vajpayee

अपने ही मन से कुछ बोलें!

अपने ही मन से कुछ बोलें! क्या खोया, क्या पाया जग में मिलते और बिछुड़ते मग में मुझे किसी से नहीं शिकायत यद्यपि छला गया

Read More »

Articlesब्रह्मलेख

• 1 day ago
Feminism in India – The Indic approach – Part 1 Part 3 – Where did things go wrong? Unfortunately, most of the Dharmic scriptures, originally...

Share now...

• 5 days ago
The distinctions of waking state, dream state, and sleep state (viswa, taijasa, and prajna) are but appearances imposed on the Atma; that is to say,...

Share now...

• 6 days ago
‘Know thyself’ is a fundamental philosophical quest. It is a quest for meaning of life. This philosophical tradition insisted that the unexamined life is not...

Share now...

• 7 days ago
Most people are unable to give a satisfactory answer to this question, what is life? Although the ordinary person can always distinguish a living being...

Share now...

• 1 week ago
There is a very clear difference between Indian and Western traditions. In the West, mind was regarded as independent of body but identical with soul....

Share now...

• 2 weeks ago
The multiplicity in the process of becoming can be fully enjoyed only through absolute renunciation of egoistic desires. Egoistic desires are only the “vital deformation...

Share now...