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Kavita

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मौत से ठन गई

ठन गई! मौत से ठन गई! जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था। रास्ता रोक कर वह खड़ी हो

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भारत जमीन का टुकड़ा नहीं

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्रपुरुष है। हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है, पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं। पूर्वी और पश्चिमी

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न दैन्यं न पलायनम्

कर्तव्य के पुनीत पथ को हमने स्वेद से सींचा है, कभी-कभी अपने अश्रु और— प्राणों का अर्ध्य भी दिया है। किंतु, अपनी ध्येय-यात्रा में— हम

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देखो हम बढ़ते ही जाते

बढ़ते जाते देखो हम बढ़ते ही जाते॥ उज्वलतर उज्वलतम होती है महासंगठन की ज्वाला प्रतिपल बढ़ती ही जाती है चंडी के मुंडों की माला यह

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जीवन बीत चला

जीवन बीत चला कल कल करते आज हाथ से निकले सारे भूत भविष्य की चिंता में वर्तमान की बाज़ी हारे पहरा कोई काम न आया

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कौरव कौन, कौन पांडव

कौरव कौन कौन पांडव, टेढ़ा सवाल है। दोनों ओर शकुनि का फैला कूटजाल है। धर्मराज ने छोड़ी नहीं जुए की लत है। हर पंचायत में

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गीत नया गाता हूँ

गीत नया गाता हूँ टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर झरे सब पीले पात कोयल की

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बजेगी रण की भेरी

दिल्ली के दरबार में, कौरव का है ज़ोर; लोक्तंत्र की द्रौपदी, रोती नयन निचोर; रोती नयन निचोर नहीं कोई रखवाला; नए भीष्म, द्रोणों ने मुख

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