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Kavita

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कहीं आजादी फिर से न खोएं।

मासूम बच्चों, बूढ़ी औरतों, जवान मर्दों की लाशों के ढेर पर चढ़कर जो सत्ता के सिंहासन तक पहुंचना चाहते हैं उनसे मेरा एक सवाल है

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पुनः चमकेगा दिनकर

आज़ादी का दिन मना, नई ग़ुलामी बीच; सूखी धरती, सूना अंबर, मन-आंगन में कीच; मन-आंगम में कीच, कमल सारे मुरझाए; एक-एक कर बुझे दीप, अंधियारे

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कवि आज सुना वह गान रे

कवि आज सुना वह गान रे, जिससे खुल जाएँ अलस पलक। नस–नस में जीवन झंकृत हो, हो अंग–अंग में जोश झलक। ये – बंधन चिरबंधन

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कण्ठ-कण्ठ में एक राग है

माँ के सभी सपूत गूँथते ज्वलित हृदय की माला। हिन्दुकुश से महासिंधु तक जगी संघटन-ज्वाला। हृदय-हृदय में एक आग है, कण्ठ-कण्ठ में एक राग है।

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कदम मिलाकर चलना होगा

बाधाएँ आती हैं आएँ घिरें प्रलय की घोर घटाएँ, पावों के नीचे अंगारे, सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ, निज हाथों में हँसते-हँसते, आग लगाकर जलना

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आए जिस-जिस की हिम्मत हो

हिन्दु महोदधि की छाती में धधकी अपमानों की ज्वाला, और आज आसेतु हिमाचल मूर्तिमान हृदयों की माला । सागर की उत्ताल तरंगों में जीवन का

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उनकी याद करें।

जो बरसों तक सड़े जेल में, उनकी याद करें। जो फाँसी पर चढ़े खेल में, उनकी याद करें। याद करें काला पानी को, अंग्रेजों की

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