जीवन की लय सधते ही लगता है ध्यान !

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हमारे जीवन मे ध्यान का एक मुख्य उदृदेश्य प्रकृति के साथ और हमारे आस पास का जो पर्यावरण हे-उसके साथ एक लय की स्थापना करना है, उसके साथ एक रिदम को स्थापना करना है । प्रकृति में हमारे आरन-पास जो कुछ भी है, जैसे-जलवायु है, औषधियाँ हैं, वनस्पतियाँ हैं, धरती है, आकाश है, उनके साथ एक संतुलन को, एक संगीत को, एक समरसता को, एक समस्वरता को स्थापित करना ध्यान का एक लक्ष्य है । अगर हम ध्यान से देखें तो हमारे अपने जीवन में एक लय है और यदि वह लय न हो तो जीवन में सौंदर्य नहीं निखरता है । जीवन में एक प्रकार की खुशी का आगमन नहीं होता है, जिससे जीवन अधूराअधूरा-सा लगता है । यह जो लय है, इसे जीवन का स्वभाव भी कह सकते हैं । इसी को हम अपने जीवन की प्रकृति भी कह सकते हैं ।

जीवन जीने की एक प्रकृति है, जीवन जीने की एक शैली है । यदि जीवन की वह शैली, वह प्रकृति या जीवन जीने का वह तरीका बिगड़ जाता है तो किं जीवन में विकृति आने लग जाती हें । जीवनशैली बिगड जाती है तो रोग शरीर व मन में आने लगते हैं और चितनशैली बिगड़ जाती है तो शोक आने लगता है । जैसे संगीत के अंदर ध्वनि में जब लय की स्थापना होती है और उसमें सुर जैसा निकलता है तो संगीत सुरीला होता है और तब उसमें एक खूबसूरती आती है ।
यदि स्वरलिपि हो और उसमें एक तारतम्य हो, आपस में एक समरसता हो, एक समस्वरता हो तो फिर जो संगीत
निकल करके आता है, वह सुनने लायक होता है और वह बडा आनंददायक होता है । यदि वो लय बिगड़ जाए, तो वह शोरगुल जैसा प्रतीत होता है । यदि कोई कुछ भी हारमोनियम पर बजाने लगे, यदि कोई कुछ भी ढोल के ऊपर बजाने लगे और उसके बीच में कोई लय न हो, कोई लिपि नहीं हो तो फिर वह अजीब-सी आवाज हो जाती है । उसको सुनना अजीब-सा लगता है । शोरगुल जो है, वह ध्वनि की विकृति का नाम है । वही ध्वनि-प्रदूषण भी है, पर वही ध्वनि यदि लयबद्ध हो जाए तो संगीत बन जाती है । शब्दों में अगर लय स्थापित हो जाए तो वह काव्य या संगीत बन जाता है और यदि लय उसमें बिगड जाए तो वह कुछ अजीब-सा अनर्गल प्रलाप हो जाता है ।

हमारे जीवन में भी ठीक इसी तरह से होता है । जेसे संगीत के अंदर स्वर जो हैं, उनके तालबद्धृ हो जाने से संगीत बनता है और उन स्वरों के वेताल हो जाने से शोरगुल हो जाता है । ठीक उसी तरह से मनुष्य के जीवन में भी लय के भिन्न-भिन्न तल हैं, भिन्न-भिन्न स्तर हैं । हमारी भी भिन्न-भिन्न तरह की प्रकृतियों हैं । जैसे एक हमारी जैविक प्रकृति है, हमारा बायोलोजिकल नेचर है । इसमें हमारे जीवन की विभिन्न क्रियाएँ चलती हैं, हमारी जो फिजियोलॉजी है वह जैविक प्रकृति क्री लय के कारण चलती है ।

जैसै हमारी पल्स चल रही है तो पल्स की अपनी गति है । पल्स तेज हो जाए तो दिवकत आ जाएगी और पल्स धीरे हो जाए तो दिवकत आ जाएगी । उसकी अपनी एक गति है, उसकी अपनी एक लय है, उसकी अपनी एक रिदम है । मेटाबॉलिज्म है तो उसकी अपनी एक रिदम है, उसकी अपनी एक लय है । वह अपनी एक गति से चल रहा है । मेटाबॉलिज्म ज्यादा होने लग जाए तो दिक्कत है, “कम होने लग जाए तो दिक्कत है” । बॉडी का टेंपरेचर है, उसकी अपनी एक रिदम है, उसकी अपनी एक लय है । यदि ज्यादा हो जाए तो फीवर हो जाएगा, कम हो जाए तो हाइपोथर्मिया हो जाएगा । ब्लडप्रेशर है तो उसकी भी अपनी एक रिदम है, वह बढ़ जाएगा तो हाई ब्लडप्रेशर हो जाएगा और कम हो जाएगा तो लो ब्लडप्रेशर हो जाएगा ।

ये सब-के-सब जो हैं, उनके अंदर अपनी एक लय है, रिदम है । यदि यह लय स्थिर रहती है तो व्यक्ति स्वस्थ रहता है और जब यह लय बिगड़ना शुरू होती है, जब यह रिदम बिगड़ना शुरू होती है, तो हमारे जीवन की ताल बिगड़ने लगती है और हम लोग इसके कारण बीमार होने लग जाते हैं ।

जीवन को भी यदि हम गहराई से देखें, तो इमका एक स्थूलतल है और उसके पीछे एक सृक्ष्मतल है। यो जो सूक्ष्मतल है, स्थूल की तरह दिखाई नहीं पडता है, लेकिन उसके पीछे भी एक और तल है जो प्राणों का है, जहाँ पर प्राणों की अपनी लय है, प्राणों का अपना संगीत है, प्राणों कौ अपनी एक लयबद्धता है । ये सारे-के-सारे आपस में जुड़े हुए हैं । हमारे ल्यूलशरीर की जो रिदम है, शरीर की जो समस्वरता है, वो अंदर के सूक्ष्म के तल के साथ जुड़ी हुई है, मन के साथ जुड़ी हुई है और मन के तल का जो संगीत है, वह प्राणों के साथ जुड़ा हुआ है और प्राणों के जो स्वर है, उनसे जीवन का स्वर भी मथा हुआ है ।

जैसे एक्यूप्रेशर होता है तो एक्यूप्रेशर के अनुसार 108 प्राण के केंद्र हैं। इन केंद्रों से होकर एक से दूसरे में प्राण प्रवाहित होता है । यदि यह प्राण-प्रवाह मंद पडने लग जाए, यदि इसके अंदर गतिरोध आ जाए तो दिक्कत आने लग जाती है। जैसे, बहती हुई नाली के बहाव में कहीं अवरोध है, तो उसके अंदर कई तरह की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं । इसी तरह से प्राण-प्रवाह भी अपना कार्य करता है । एक्यूप्रेशर में कहते हैँ कि इनमें भी यदि एक के अंदर प्राण-प्रवाह मंद होता है, अवरुद्ध होता है तो दूसरी चीजों को वह प्रभावित करने लगता है । इसीलिए जिन्होंने भी एक्यूप्रेशर, एक्यूपंक्चर खोजा है, वो पहले प्राण-प्रवाह को चिन्हित करते हैं । वहाँ पर कुछ दबाव डालते हैं, वहाँ पर कुछ किया करते हैं, ताकि वहाँ जो प्राण-परिपथ का प्रभाव है, वह फिर से सुचारु रूप से चालू हो जाए ।

इस प्राण मेँ फिर एक सूक्ष्मतत्त्व और घुला हुआ है और वह जो सूक्ष्मतत्त्व है वो हमारे मन का है, विचारों का है, हमारी कल्पना का है, हमारी भावनाओँ का है । यदि उसमें कहीं विक्षोभ आ जाए, यदि उसमें कहीं कोई दिक्कत आ जाए तो फिर पूरे शरीर के अंदर, व्यक्तित्व के अंदर दिक्कतें आनी शुरू हो जाती हैँ । ऐसे ही देह से मन और मन से प्राण जुड़ा हुआ है । यदि हम एक को प्रभावित करते हैं तो दूसरा सहजता से प्रभावित होने लग जाता है । इस तरह शरीर है, मन है, प्राण है-ये तीनों-के-तीनों तल अपनी एक लयबद्धता से चल रहे हैं । यदि इस लयबद्धता के बीच में किसी तरह का असंतुलन होता है तो फिर इसके अंदर व्यतिक्रम आना शुरू होता है और इस व्यतिक्रम के कारण अलग-अलग तल पर अलग-अलग तरह की दुर्घटनाएँ घटती हैं ।

ध्यान का जो उदृदेश्य है, वो इस विकार को यानी यह जो लयबद्धता में व्यतिक्रम आया है, उसको फिर से स्थापित करना है । ध्यान से हम असंतुलन को संतुलित करते हैं, इसको फिर से एक लय प्रदान करते हैं । यही ध्यान का उद्देश्य है।

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