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बुद्ध शब्द का वर्णन वाल्मिकी रामायण में भी है और महाभारत में भी है।

बुद्ध शब्द का वर्णन वाल्मिकी रामायण में भी है और महाभारत में भी है।

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जहां जहां जिस ग्रंथ में सांख्य दर्शन की चर्चा आई है, वहां वहां आप बुद्ध शब्द प्रयोग में पाएंगे। भारतीय ज्ञान परंपरा की जिन्हें रत्ती मात्र जानकारी नहीं है, वो इसे भगवान बुद्ध से जोड़ देंगे और कहेंगे कि देखिए इसमें भी बुद्ध का वर्णन है, इसका मतलब ये है कि ये ग्रंथ बुद्ध के बाद लिखे गए। ऐसे महानुभावों को सनातन वैदिक हिन्दू धर्म और उसकी परंपरा के विविध दर्शनों के बारे में गहराई से बार बार अध्ययन करना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता में भी बुद्धि और बुद्ध से जुड़े शब्द अनेक अवसरों पर उल्लिखित है।

है न सोचने की बात। यह इसलिए है क्योंकि जहां जहां सिद्धों की, मुनियों की और उनसे जुड़े सांख्य दर्शन की चर्चा होगी वहां वहां बुद्ध, बुद्धि और सिद्ध, सिद्धार्थ आदि शब्द प्रयोग में आएंगे ही। जो भी तपस्वी या ज्ञानी सांख्य दर्शन में निष्णात होकर उसके अनुसार साधना में सिद्ध हो जाता था, या ध्यान के प्रयोग से दर्शन को व्यवहार में उतार लेता था, उसे भारतीय सनातन परंपरा प्रारंभ से सिद्ध और सिद्धार्थ कहती रही है, उसे ही बुद्ध भी कहने की परंपरा है। सांख्य अर्थात सम्यक आख्यान अर्थात सम्यक ज्ञान। सांख्य शास्त्र शुद्ध तर्कपूर्ण ज्ञान के आधार पर अपनी तत्व चर्चा आगे बढ़ाने का ही दर्शन है। सांख्य के इसी सम्यक ज्ञान को गौतम बुद्ध ने भी नवीन शब्दावली में नवीन व्याख्या के साथ सम्यक रुप से प्रस्तुत किया। इसके प्रवर्तक कपिल मुनि कहे गए। भगवान कृष्ण ने गीता के 10वें अध्याय में कहा है-सिद्धानां कपिलो मुनिः।26.10। अर्थात ‘सिद्धों की परंपरा में मैं कपिल मुनि हूं।’ आगे भगवान कहते हैं कि मुनियों की परंपरा में मैं व्यासमुनि हूं। व्यास जी महर्षि भी हैं और मुनि भी हैं। क्योंकि वह सर्वज्ञ हैं, सभी वेदों और सभी दर्शनों के ज्ञाता हैं इसलिए वह ऋषि-महर्षि और इसके साथ मुनि भी हैं क्योंकि वह षड्दर्शन समेत सांख्य में भी निष्णात हैं।

कपिलमुनि जन्मजात सिद्ध थे। सांख्य के सभी मतवादी इन्हें अपना प्रणेता आचार्य और सिद्ध परंपरा का गणाधीश मानते हैं। इस प्रकार सांख्य के सभी ज्ञानी अधिकांशतः ऋषि की बजाए मुनि संज्ञा से ही पुकारे गए हैं। ऋषि-महर्षि होने के लिए आन्वीक्षिकी और त्रयी से जुड़े अन्य सभी विषयों का भी ज्ञाता होना पड़ेगा लेकिन जो केवल सांख्य में प्रवृत्त होगा, उसे विशेष रूप से मुनि कहने की परंपरा सनातन काल से चली आ रही है। मुनि कहने से सांख्य परंपरा स्वयमेव सम्मुख आ जाती है। इसलिए गौतम बुद्ध भी कपिलमुनि की परंपरा में शाक्य मुनि कहे गए। गौतम बुद्ध तथागत भी कहे गए। यह तथागत शब्द भी वैदिक परंपरा से उत्पन्न होता है जिसका तात्पर्य उस अवस्था विशेष से होता है जहां जाकर फिर लौटना नहीं होता अर्थात ‘न स पुनरावर्तते’। बुद्ध मुक्त अवस्था का नाम है इसलिए वह तथागत भी हैं। इसमें मुक्त अवस्था प्राप्त करना सबसे आवश्यक तथ्य है।

यही कारण है कि गृहत्याग करने के बाद जब आलार कलाम से और रामपुत्त से गौतम ने सांख्य दर्शन और ध्यान-योग का ज्ञान प्राप्त कर लिया तो भी वह बुद्ध नहीं कहलाए। जब उन्होंने बोध गया में उस दर्शन को व्यवहार में उतारकर अनुभूति अर्जित कर ली तब उन्हें बुद्ध कहा जाने लगा, सिद्धार्थ भी कहा गया। इसीलिए कहा गया क्योंकि जो भी सांख्य दर्शन की साधना उत्तीर्णकर प्रायोगिक परीक्षा भी पास कर लेता था, उसे बुद्ध की या सिद्धार्थ की उपाधि देने की परंपरा उपनिषदकाल से ही भारत में चली आ रही है।

गौतम बुद्ध जो इक्ष्वाकुवंशी शाक्यकुल में जन्म लेने के कारण शाक्यमुनि भी कहे गए हैं, उनके साथ मुनि, सिद्धार्थ और बुद्ध ये तीनों नाम जुड़ते हैं तो कारण उपर्युक्त परंपरा ही है। आजकल के वामपंथी दार्शनिक इन बातों को जानबूझकर अध्ययन या अध्यापन में शामिल नहीं करते क्योंकि ऐसा बताने से विभाजनकारी एजेंडा नष्ट हो जाएगा, विद्यार्थियों को भारतीय परंपरा का सही ज्ञान प्राप्त होगा।

आप सभी को यह जानकर हैरानी होगी कि जब गौतम बुद्ध को सिद्धि प्राप्त हो गई तो वह सबसे पहले अपने गुरु आलार कलाम के पास ही गए ताकि उन्हें इसकी सूचना दे सकें और अपनी अनुभूति में प्राप्प ज्ञान को उन्हें बताकर उनसे पूछकर आगे की यात्रा कर सकें लेकिन आलार कलाम और रामपुत्त दोनों ही तबतक स्वयं ही निर्वाण प्राप्तकर चुके थे। इसके बाद गौतम बुद्ध ने सारनाथ की ओर प्रस्थान किया, जहां उनके पूर्व सहयोगी उन्हें छोड़कर चले गए थे।

यहां चर्चा निर्वाण और धर्मचक्रप्रवर्तन की भी आती है। ये दोनों शब्द और उनके भाव गौतम बुद्ध के बहुत पहले से भारतीय परंपरा में प्रचलित है। महाभारत के अनेक आख्यानों में इनका विस्तार से वर्णन है। इन सब बातों पर और इनके साथ अन्य महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर शीघ्र ही विस्तार से धारावाहिक लेखन करने का मेरा विचार है।

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