।।श्री गणेशाय नमः।। हरिओम तत्सत।।
भारत में प्राचीन काल से पशुपालन की वैज्ञानिक पद्धति प्रचलित रही है। प्रत्येक अहिंसक और नित्य के जीवन के लिए उपयोगी प्राणी किसी न किसी प्रकार से मानवीय व्यवस्था का हिस्सा बने और बनाए गए। सुविचारित ढंग से जो सामाजिक व्यवस्था बनी उसमें एक एक विशेष समूह ने एक एक प्राणी के पालन की और उस पशु से संबंधित व्यवहार की बारीकियों को इतनी गहराई से समझा और जान लिया कि आज का मनोविज्ञान भारत की इस परंपरा को जानकर चकित हो जाए।
सर्वसामान्य समाज के मन में प्राणि मात्र के प्रति आदर और ममत्व का भाव जगाने के लिए ही मूक प्राणियों को दैवीय परंपरा से जोड़ा गया। हड़प्पाकाल के इतिहास से लेकर आजतक अपने ग्रामीण और वन्य जीवन में वह परंपरा हम देखते चले आ रहे हैं। इस तथाकथित स्वतंत्रता और इसके पूर्व के गुलामी के काल में इस परंपरा पर सबसे ज्यादा विकट प्रहार किया गया। किसने किया, क्यों किया और किसके रोजगार को नष्ट करने के लिए किया?
पशुपालन करने वाले लोग भारत में कभी गरीब नहीं थे और ना ही किसी के गुलाम या दास ही थे, और हां, अंग्रेजीराज की सेक्युलर व्यवस्था के पूर्व उनका कोई शोषण भी नहीं होता था। इसके विपरीत अपने पालतू प्राणियों को सजा-धजाकर जब महावत या उस प्राणी का स्वामी ग्राम और वीथिकाओं में, पुर और नगर पथ पर निकलता था तो धन-धान्य की वर्षा उसके ऊपर होने लगती थी।
मंदिरों के दरवाजे स्वयं ही खुल जाते थे। आम जन से लेकर ब्राह्मण और राजा सब इनकी आरती उतारते थे। केरल में, तमिलनाडु में, कर्नाटक में इन पंरपराओं का पालन आज भी किंचित ही क्यों ना हो, सही ढंग से होता आ रहा है। दौलत इनके चरणों में यह समाज बिखेरता चला आया है, हजारों सालों से। अपने गांव, वन्यक्षेत्र में अपने प्राणियों के साथ रहने वाला यह समाज सदा से स्वायत्त ही रहा है।
आज भी इस परंपरा के अवशेष हमें गाहे-बगाहे हर स्थान पर देखने को मिलते हैं।प्रत्येक प्राणी के लिए प्रेम, प्रत्येक जीव के लिए ममता। इसीलिए समाज अपना सर्वस्व इन प्राणियों पर और इन्हें पालने वालों पर सदा सर्वदा से लुटाता चला आया है। न्यौछावर और नेग आदि जो शब्द हैं इनके बगैर अधूरे हैं। इन मूक प्राणियों को पालने की प्रथा पर कुछ मुगल काल में तो अधिकतर अंग्रेजियत के पराधीनता काल में धीरे धीरे लगाम लगने लगी।
मुगलकाल में इसलिए कि विरोधी राजा को इन प्राणीपालक समाज का सहारा न मिले और अंग्रेजी राज में इसलिए कि उन्हें भी इनसे डर ही लगा करता था। इसी के साथ इन्हें पालने वाले सारे समाज वर्गों की आय के साधन भी जाते रहे। जो अपने पालतू पशुओं के मस्तक पर स्वर्ण-चांदी का भंडार लादकर, सजा-धजाकर झूमते मस्ती से चलते थे, कोई पशु ऐसा नहीं था जिसे सोने-चांदी से सजाए-ध्वजाए बगैर रखा जाता था इस देश में।
उन पशुपालकों की आज की माली हालत की कल्पना सहज ही की जा सकती है। राज्य का कोष उनके लिए सदा ही खुला रहता था। सैन्यदल में जो चतुरंगिणी की कल्पना है, उसमें हाथी दल, अश्वदल और रथों का प्रयोग अनिवार्य था। वही भेदभाव का शिकार हुए तो किसने किया था ये भेदभाव। नवदलितवादी चिंतक किसे दोषी ठहराएंगे। 

आज हमारी सोचने की शक्ति ही कुंद हो गई है तो कोई क्या करे और क्या कहे। जो कल मालिक और महावत थे आज वो ‘दलित’ हो गए। इन प्राणियों के पालक अब या तो एससी में हैं या एसटी में हैं, कई राज्यों में ओबीसी हैं। किस व्यवस्था ने मालिकों को ‘दलित’ बना डाला। इनके हाथ की कला, इनका हुनर, इनकी गहरी और बारीक समझ, इनकी कुशलता का मोल अब नहीं रहा और जो परंपरा से मोल कर रहे थे, वह भी मानो बीते दिन की बात हुई।

दूसरे, इनके संरक्षण में पलने वाले प्राणी अब केवल भोजन के लिए मारे मारे फिरने को बाध्य हैं क्योंकि संवैधानिक राज्य इनकी रक्षा के वचन का पालन शब्दों के अलावा करने में ही सक्षम नहीं। मनुष्य की ही रक्षा कठिन है तो इन बेजुबान प्राणियों की रक्षा की बात क्या की जाए।

गुलामी और पराधीनता ने कैसे कैसे दिन इस देश को दिखाए हैं, सोचो, समझो और जागो।

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