Menu
हम भाग्यशाली हैं क्योंकि हम पता ही नहीं कि हम लोग कितने निर्धन हैं

हम भाग्यशाली हैं क्योंकि हम पता ही नहीं कि हम लोग कितने निर्धन हैं

Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on telegram
Share on whatsapp

इस सप्ताहांत अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रबंध निदेशिका – क्रिस्टीना जॉर्जीवा – का इंटरव्यू पढ़ रहा था। जॉर्जीवा बुल्गारिया की नागरिक है। साम्यवादी बुल्गारिया में बिताए गए बचपन और युवावस्था के समय आर्थिक संकट के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि 70 के दशक में एक जापानी प्रतिनिधिमंडल बुल्गारिया घूमने आया था। तब जॉर्जीवा वहां के एक विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हुआ करती थी। चूंकि जॉर्जीवा और उनके सहयोगियों ने पहले कभी जापानी लोगों को नहीं देखा था तो उन लोगों ने जापानियों का स्वागत-सत्कार भोजन एवं वाइन (मदिरा) से किया। जब जापानियों पर थोड़ा सा नशा चढ़ गया तो उनमें से एक ने भोज समाप्त होने के बाद कहा, ‘आप लोग भाग्यशाली हैं क्योंकि आप लोगों को पता ही नहीं कि आप कितने निर्धन हैं’।
यही फीलिंग मुझे भी हुई थी जब मैं सपरिवार वर्ष 2002 में फ्रांस गया था। एक महीने बाद वहां के एक जिले के प्रिफे (préfet) के साथ ट्रेनिंग पर लगा दिया गया। फ्रांस का प्रिफे भारत के जिलाधिकारी की तरह होता है, लेकिन जिलाधिकारी से भी अधिक शक्तिशाली क्योकि प्रिफे का रोल वहां के संविधान में उल्लिखित है और उनकी ट्रांसफर-पोस्टिंग वहां के राष्ट्रपति करते है। कुछ ही समय में प्रिफे के ऑफिस के सभी कर्मियों से मेरी अच्छी मित्रता हो गयी थी। एक दिन प्रिफे के ड्राइवर (chauffeur) ने सपरिवार हमें अपने घर रात्रि भोज पर आमंत्रित किया जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। (जानकारी के लिए, भारत में भी कार्यालय के किसी सहकर्मी के साथ सपरिवार अंतिम भोजन मैंने अपने ड्राइवर इकरामुद्दीन के घर में किया था; इकरामुद्दीन जी ने हमें सपरिवार आमंत्रित किया था)
ड्राइवर महोदय सायः काल में अपनी निजी कार से लेने आए। जब हमने उनके घर में प्रवेश किया तो वहां की विलासिता देखकर आँखे चुंधिया गयी। उस विलासिता के वर्णन की आवश्यकता नहीं है। फर्नीचर, लकड़ी की टाइल, रसोई के उपकरण, बाथरूम इत्यादि कही भी उस समय के भारत सरकार के सचिव के घर से भी बेहतर थे। उस समय मैं स्वयं भारत सरकार का अधिकारी था; पत्नी भी कमाती थी। तब मुझे पहली बार महसूस हुआ कि हम भारतीय कितने निर्धन थे। एक तरह से हम भाग्यशाली थे क्योंकि हम पता ही नहीं कि हम लोग कितने निर्धन थे।
जॉर्जीवा ने आगे बताया कि पुत्री को पिलाने के लिए दूध लेने के लिए वह चार बजे उठकर लाइन में लगती थी। अगर कभी देरी हो जाती थी तो पुत्री को दूध नहीं मिलता था।
मुझे भी अपनी किशोर एवं युवावस्था का समय याद आ गया। बिजली गायब है, कोई बात नहीं; ट्रेन 12 घंटे लेट, स्वीकार है; सड़क टूटी फटी है; हमारी नियति है; बैंक अकाउंट खोलने में आनाकानी करता है, यह कौन सी बड़ी बात हो गई; उद्यम लगाना है, लोन नहीं मिलेगा, क्योकि हमारा चेहरा ही ऐसा है; गैस सिलेंडर के लिए लाइन लगानी है, चलो लाइन में लगकर गप्प मार लेंगे.
हर समस्या, हर परेशानी के लिए हम अपने दिल को बहला लेते थे. एक तरह से हम भारतीयों की यही नियति होकर रह गई थी.
हम लोगो ने अपने आस-पास होने वाले भ्रष्टाचार को स्वीकार करना सीख लिया था. राजनीतिज्ञों को गाली देते और जिंदगी के संघर्ष में पुनः जुट जाते हैं. उसी गंदी, बदबूदार, भिनभिनाती गलियों, गड्ढो से भरी सड़कों पर चलना और एक-एक पाई के लिए संघर्ष करते रहना.
जबकि अभिजात वर्ग विलासिता पूर्ण जिंदगी जीते, देश विदेश में छुट्टियां मनाते और तो विदेश में बसे अपने परिवार को भी सरकारी खर्चे पर मौज कराते. हम सब देखते और समझते थे, लेकिन बदले में उसी अभिजात वर्ग की सरकार को चुनते रहते.
आज प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि “इतिहास बताता है कि गांव और गरीब को अभाव में रखना कुछ लोगों की राजनीति का आधार रहा है … ऐसे लोगों को लगता है‍ कि अगर गांव, गरीब, किसान, आदिवासी सशक्‍त हो गए तो उनको कौन पूछेगा, उनकी दुकान नहीं चलेगी, कौन उनके हाथ-पैर पकड़ेगा? कौन उनके सामने आ करके झुकेगा? इसलिए उनका यही रहा कि गांव की समस्‍याएं बनी की बनी रहें, लोगों की समस्‍याएं बनी की बनी रहें ताकि उनका काम चलता रहे। इसलिए काम को अटकाना, लटकाना, भटकाना यही उनकी आदत हो गई थी।”
मैं कई बार लिख चूका हूँ कि भारत के अभिजात वर्ग ने भ्रष्ट व्यवस्था की संरचना जानबूझकर कर की थी, ना कि नासमझी में। उनका पूरा ध्यान अपने आप को और अपने मित्रों को समृद्ध करना था और उन्हें धनी बनाना था। जनता को जानबूझकर गरीब रखना था, क्योंकि गरीब जनता को वह बहला-फुसलाकर, लॉलीपॉप देकर वोट पा सकते थे।
आज प्रधानमंत्री मोदी ने भी यही कहा है।

लेखक – अमित सिंघल

प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा भ्रष्ट अभिजात वर्ग के रचनात्मक विनाश के बारे में आप अमित सिंघल जी की पुस्तक में विस्तार से पढ़ सकते हैं

हम भाग्यशाली हैं क्योंकि हम पता ही नहीं कि हम लोग कितने निर्धन हैंहम भाग्यशाली हैं क्योंकि हम पता ही नहीं कि हम लोग कितने निर्धन हैं

 

अमेज़न और व्हाट्सप्प से आर्डर पर उपलब्ध।।

Sharing Is Karma

Share on facebook
Share
Share on twitter
Tweet
Share on linkedin
LinkedIn
Share on telegram
Telegram
Share on whatsapp
WhatsApp
Share on facebook
Share on twitter
Share on telegram
Share on whatsapp

Lekh लेख

• 21 hours ago
  व्यक्ति के जीवन में परिवार की भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण होती है । परिवार में रहकर ही व्यक्ति सेवा, सहकार, सहिष्णुता आदि मानवीय गुणों...

Share now...

• 3 days ago
Garuda, a very popular character in the history of Sanatana Dharma. I think there was no one in Sanatana Dharma who didn’t admire Bhagwan Garuda...

Share now...

• 3 days ago
Hindu concepts of Hiranyagarbha (golden womb) and Brahmanda (the first egg), are comparable to cosmic egg origin systems. The Bhagavata Purana, Brahmanda Purana, Vayu Purana...

Share now...

• 3 days ago
कृष्ण और सुदामा की दोस्ती से तो सब वाकिफ ही होंगे। अगर किसी को कभी दोस्ती की मिसाल देनी हो तो सबसे पहला नाम कृष्ण...

Share now...

• 1 week ago
कुछ वर्षों पहले एक ब्रिटिश पर्यटक ने गुरुग्राम की कुछ शानदार तस्वीरें शेयर करते हुए लिखा था विश्वास नही होता भारत इतना समृद्ध है। हरियाणा...

Share now...

• 1 week ago
हमारे एक मित्र हैं । पारंपरिक बिजनिसमैन हैं ……. आजकल दिन रात Online कंपनियों को गरियाते हैं । कहते हैं कि सरकार को इनको Ban...

Share now...

Brahma Logo Bhagwa