जो खर्च करता है, उसके पास और आ जाता है

जो खर्च करता है, उसके पास और आ जाता है

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हमारे एक पड़ोसी हैं, वे दिन में दो-तीन बार बिजली मीटर चेक करते हैं कि कितनी खपत हुई ?
कल पहली बार किसी काम से उनके घर जाना हुआ !
पूरे घर में घुप्प अंधेरा था ! सिर्फ ड्राइंग रूम में एक धीमी रोशनी का बल्ब जल रहा था !
मुझे देखकर उन्होंने एक लैम्प और चालू कर लिया ! वह भी उतना ही डिम था जितना कि पहले वाला !
मैंने पूछा “बड़ा अंधेरा है घर में? ”
वे बोले “हां, हम लोग जिस कमरे में होते हैं बस वहीं की लाइट जलाते हैं, बाकी सब बंद रखते हैं !”
उनके घर के सब खिड़की दरवाज़े भी बंद थे ! ताजी हवा ना आने से, पूरा घर एक अजीब सी गंध से दंदा रहा था!
मुझे बड़ी मनहूसियत और सफोकेशन सा लगा, लिहाजा मैं जल्दी लौट आया !
वे सज्जन सेंट्रल गवर्नमेंट में बड़े अधिकारी हैं! उनकी एक ही संतान है और गांव में दो सौ एकड़ पैतृक जमीन व मकान भी है ! मगर वे जिंदगी ऐसी जी रहे हैं जैसे कैदियों के बैरक में रह रहे हों !
वे कंजूस हैं !
वे हर जगह से पैसा बचा रहे हैं ! जिंदगी सिकुड़ती जा रही है.. पैसा बढ़ता जा रहा है !
भारत में ज्यादातर लोग ऐसा ही जीते हैं ! उनके जीवन का त्रिसूत्रीय कार्यक्रम होता है – पैसा कमाना, पैसा बचाना और बचे हुए पैसे से और पैसा कमाना !
उनके घरों की ही तरह उनके जीवन में, जीवन की कोई सुगंध नहीं होती ! सिर्फ ‘अनजिए’ की दुर्गंध होती है !
क्योंकि वह पैसा जोड़ते हैं, पैसा खर्च नहीं करते ! और अगर खर्च भी करते हैं तो किसी निवेश की तरह, यानि.. शहर के बाहर एक बड़ा मकान, एक बड़ी गाड़ी.. और बेटे की भव्य शादी !
तीनों ही स्थितियों में, उनका पैसा, उनके ही पास रहा आता है, उनके घर से बाहर नहीं निकलता !
उनका जीवन, उनके परिवार से बड़ा नहीं होता !
इसलिए,
वे हर उस जगह से हाथ से सिकोड़ लेते हैं जहां किसी और को पैसा देना हो !
वे मजदूर से एक-एक रूपये के लिए तकाज़ा करते हैं ! वे मिस्त्री से, इलेक्ट्रीशियन से, फल-सब्ज़ी वालों से चिंदी चोर की तरह पांच-पांच, दस-दस रुपए बचाते हैं..ताकि अपने अमीर ‘पोचू’ बच्चे की शादी पर पांच करोड़ ख़र्च कर सकें !
इस कंजूस मनोवृत्ति के चलते ही, वह श्रमिक से ज्यादा से ज्यादा काम करवाते हैं ! जितनी दिहाड़ी दी है, पूरी वसूलते हैं ! तीन बजे बजे काम खत्म हो जाए, तो बचे हुए दो घंटे, उससे घर के काम करवाते हैं !
उन्हें बस अपने घर की परवाह है! मजदूर, घर जल्दी पहुंच जाए इसकी उसे परवाह नहीं है ! क्योंकि मजदूर दो घंटे जल्दी घर पहुंच कर क्या कर लेगा? क्योंकि उनके लिए मजदूर इंसान थोड़े ही है, मज़दूर है !
भारत की तरक्की में, यह कंजूस मनोवृत्ति ही सबसे बड़ी बाधा है ! भारत की आर्थिक सामाजिक असमानता के मूल में, भारत के आदमी की यह संकीर्ण मनोवृत्ति कार्यरत है ! इसी के चलते अमीर और अमीर होता जा रहा है और गरीब और गरीब !
अमीर का पैसा गरीब तक नहीं पहुंच रहा क्योंकि अमीर के हृदय की पहुँच गरीब तक नहीं है!
अव्वल तो उसकी पहुंच स्वयं की जीवन चेतना तक भी नहीं है !
वह पैसा कमा रहा है, पैसा खर्च नहीं कर रहा ! पैसा जुटाने के बाद भी उसका व्यक्तित्व रुखा सूखा, निस्तेज और ठंडा है !
क्योंकि वह पैसे का मालिक नहीं है वह पैसे का चौकीदार है ! पैसा तो उसका है जो पैसा खर्च करता है !
आखिर पैसे को बचाकर आप क्या कीजिएगा, अगर आप उसे खर्च ही ना करें !!!
तो फिर जो पैसा ख़र्च नहीं किया जा रहा, वह आखिर किसके लिए कमाया जा रहा है ???
बाप बिना जिए मर जाता है और पूरा पैसा संतान को मिल जाता है ! फिर संतान से उसकी संतान को.. और उसकी संतान से, उसकी संतान को !
अंततः खानदान की तीसरी-चौथी पीढ़ी में कोई असली मालिक आता है, और पूरा पैसा अय्याशी में खर्च कर देता है अथवा कोई तुगलक व्यापार में गंवा बैठता है !!
… और सब पैसा खत्म हो जाता है !
तीन पीढ़ी पैसे की तकैयागिरी करती है, फिर चौथी पीढ़ी उसे खत्म कर देती है !
… प्रश्न फिर से वही है कि फिर किसके लिए पैसा कमाया, बचाया जा रहा है?
किसके लिए इतनी कंजूसी से जिया जा रहा है.. और बचाए पैसे का पुनर्निवेश किया जा रहा है??
आपका पैसा, आपका पैसा है उसे जीने में खर्च करें और जिएं !
पैसे का सर्वश्रेष्ठ निवेश है – पैसा खर्च करना !
मौत के बाद पैसा आपके साथ नहीं जाता, चेतना साथ जाती है !
अगर आपने जीवन जीने पर पैसा खर्च किया है तो उन जिए हुए क्षणों का अनुभव चेतना के साथ जाता है, जुटाया हुआ पैसा नहीं !!!
अगर आप दूसरे पर, मुक्त हस्त से खर्च करते हैं तो उसका आनंद और संतोष चेतना को बड़ा करता है !!
वास्तविक कमाई तो चेतना की कमाई है, पैसे की नहीं !
अपनी कमाई अपने जीने पर खर्च करें !
आप अपने लिए कमा रहे हैं न कि किसी आगामी अय्याश, या खजाना लुटा देने वाले गयासुद्दीन तुगलक के लिए !!
कंजूसी से न जिएं ! कमाएं और खर्च करें!
पूरा ब्रह्मांड, पूरी प्रकृति इंफ्लक्स में जीती है !
वो सूरज हो कि वृक्ष,
दरिया हो कि बादल… जितना जुटाते हैं उतना ही लुटा देते हैं !
प्रकृति में कोई कंजूस नहीं है ! न ही कोई एकाकी जीता है ! सब, सबके साथ बाँटकर जीते हैं !
..बाहर का आदमी भी खर्च करके जीता है ! एक भारत का आदमी ही है जो “टुचुक-टुचुक” जीता है ! कंजूसी से जीता है !
एक बार हमने अपने एक कंजूस मित्र से कहा कि “तुम्हारा एक ही पुत्र है, सौ एकड़ ज़मीन है, गांव में दो मकान हैं, क्लास वन ऑफिसर हो, बैंक बैलेंस है…फिर इतनी कंजूसी से क्यों जीते हो ? ”
“मरने के बाद तो वैसे भी तुम्हारी सारी संपत्ति, मकान, ज़मीन तुम्हारे पुत्र को ही मिलेगी, तुम अपना जीवन तो जी लो !”
तो उन्होंने बताया कि वो किसी अनजान आपदा की आशंका से पैसा बचा कर रखते हैं मसलन.. रोग, घाटा, चोरी आदि !
हमने कहा ‘आप आशंका करते ही क्यों हैं ? ये तो Law of attraction है कि आप जो सोचते हैं वह हो जाता है !’
ये सच है कि जो जितना बचाता है उसका उतना ही निकल जाता है !!
और मजे की बात है जो खर्च करता है, उसके पास और आ जाता है !
‘जैसी नीयत वैसी बरक़त’

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