खेती-किसानी और हिन्दू समाज की बुनावट का मतलब समझते हैं?

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मेरा अपना अनुभव है, मनरेगा, रुपए किलो चावल! यह सब भारतीय कृषि के विनाश के औजार बनें। साथ ही पिछले सत्तर सालों में खेती-किसानी को घाटे का सौदा बनाकर किसानी उजाड़ दी गई।
यह काम जरूरी था। वरना शहरीकरण में हो रहे “रियल इस्टेट बूम” से लेकर उदारीकरण में खुली तमाम फैक्ट्रियों को “मानव श्रम” कहाँ से मिलता? मजूर आसमान से तो टपकेंगे नहीं। तो हमले का निशाना बनी खेती-किसानी। खेती आश्रित बहुसंख्य हिन्दू आबादी। वनवासी। शहरी मजूर की जरूरत खेती-किसानी के विनाश से पूरी की गई।
शायद यही वजह है, सत्तर के दशक से खेती-किसानी को “डिसगाइज अन इंप्लायमेंट” यानी “प्रछन्न बेरोजगारी” का सबसे बड़ा सेक्टर करार दिया गया। बड़े-बड़े अर्थशास्त्री, प्रोफेसर्स, यूनिवर्सिटीज इस अभियान में जी-जान से जुटे। और कामयाबी भी मिली। आज हिंदुओं की ना जाने कितनी ही नस्ल इस सोच के साथ खड़ी है।
लेकिन कभी खेती उपज का “वेल्यू एडिशन” कर गांव की आबादी को गांव में रोकने की पहल नहीं हुई।
यहां एक विनम्र निवेदन रखना चाहूंगा। पिछले दस साल के यात्रा अनुभव से समझ आया..खेती-किसानी चौपट होने का मतलब है, सनातन समाज का विनाश। यह पूरा षड्यंत्र “पाश्चात्य जगत” और भारत के ही “नव धनाढ्यों” का ही रचा हुआ है। जिसे “कथावाचक हिन्दू बौद्धिक” आज भी समर्थन दे रहे हैं। क्योंकि इनकी जीविका-समृद्धि के आधार में यही षड्यंत्र और कुचक्र है। इसी के ही हिस्से हैं ये। खेती-किसानी को औपनिवेशिक दौर से कभी निकलने ही नहीं दिया।
फिलहाल खेती-किसानी और सनातन के अंतर्संबंधों के विस्तार में अभी नहीं जा रहा हूँ। इस पर अलग से लिखूंगा। यहां सिर्फ विषय प्रवेश कर रहा हूँ।
इस “प्रछन्न बेरोजगारी” नेरेटिव का परिणाम क्या हुआ ? सत्तर सालों में कोई बीस करोड़ परिवार अपने-अपने “सांस्कृतिक पर्यवासों” से जबरिया उजाड़ कर शहरी और उद्योगों के मजूर बना दिए गए। ओर यदि अध्ययन हो तो आप पाएंगे, इस उजड़ी आबादी में बहुसंख्य हिन्दू हैं। लेकिन हिंदुओं के पास तो अपने समाज के “सामाजिक अध्ययन सनस्तन” भी नहीं हैं। तो दिशा कैसे मिले ?
शहरी मित्रों ने कभी सोचा है, आज जो हमारे आसपास खेलावन, घरहु या कतवारू घूमते हैं, कौन हैं ये ? क्या आसमान से टपके ? क्या इनका कोई सांस्कृतिक पर्यावास नहीं था कभी ?
यदि आप “सांस्कृतिक पर्यावास” का मतलब समझते हैं ? खेती-किसानी और हिन्दू समाज की बुनावट का मतलब समझते हैं तो बहुत आसानी से समझ जाएंगे, कैसे हिन्दू समाज को अपनी ही धरती से विस्थापित किया गया ? कैसे हुनरमंद जातियों को उजाड़ा गया ? कैसे हिन्दू समाज को छिन्न-भिन्न कर पीछे से म्लेच्छों की बसाहट की गई।
यहां कई अधीर मित्र सवाल उठाएंगे…फिर मोदी क्यों मनरेगा को बढ़ावा दे रहे हैं ? उत्तर है, क्योंकि मोदी आपकी तरह अधीर और कूपमंडूक नहीं है, पहले “डिफेंस लाइन” तैयार करता है, फिर ध्वंस। मोदी का ध्वंस बहुत रचनात्मक है।
बस! यही सब लिखता हूँ, बताने की कोशिश करता हूँ तो “प्रछन्न बेरोजगारी” समर्थक नव धनाढ्य हिन्दू लेबल चस्पा करते हैं, दादा! आपका वामपन्थ जाग उठा ! नहीं तो आप अपने रास्ते! अपन का रास्ता तो पहले से निर्धारित है।
यदि आप “सर्व हिन्दू समाज” के प्रति सरोकार रखते हैं, “विकास बनाम विनाश” के कुचक्र को समझते हैं तो मेरी बात भी समझेंगे।
परिवर्तनों का स्वागत कीजिए। सर्व हिन्दू समाज के साथ खड़े होइए। किताबों से ज्यादा समाज का, वास्तविक जमीन का अध्ययन कीजिए।
मुझे नहीं पता, पोस्ट कितनों को समझ आएगी। वैसे भी युवाओं के लिए लिखता हूँ। बौद्धिक जुगाली केवल छात्र जीवन में की। समझ बढ़ाने के लिए। आज अपनी धरती को पढ़ने-समझने का प्रयास चल रहा है। आज Application of knowledge का अदना सा यात्री हूँ।
अभिनन्दन!
Source – Sumant B Lekh on Facebook

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