लोक सभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया में एक नए आर्डर या व्यवस्था ने आकार लिया। भांति- भांति के मैकेनिज्म तैयार हुए, ताकि विश्व को युद्ध के बाद एक सुचारू ढ़ग से शांति की दिशा में ले जाया जाए। लेकिन शांति की बातो के बीच भी हर कोई जिसकी ताकत थी, अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने लगा। जितने इन्नोवेशन हुए, रिसर्च हुए वो इसी कालखंड में हुए, सैन्य शक्ति के लिए।

कोरोना काल के बाद भी भी एक नया वर्ल्ड ऑर्डर उभर रहा है और विश्व में नए संबंधों का वातावरण शेप लेगा। हमें तय करना है कि हम विश्व युद्ध के बाद एक मूकदर्शक के रूप में बदलती हुई दुनिया को देखते रहे और अपने आपको कहीं एडजस्ट कर ले। या भारत एक मजबूत शक्ति के रूप में अपने आप को स्थापित करे। लेकिन सिर्फ जनसंख्या के आधार पर हम दुनिया में अपनी मजबूती का दावा नहीं कर पाएंगे। नए वर्ल्ड ऑर्डर में भारत को अपनी जगह बनाने के लिए भारत को सशक्त होना पड़ेगा।

क्या हुआ था द्वितीय विश्व युद्ध के बाद?
विश्व समुदाय का कैसे पुनर्गठन हुआ था?
जितने इन्नोवेशन हुए, रिसर्च हुए वो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के कुछ वर्षो में क्यों हुए?
आखिरकार प्रधानमंत्री मोदी भारत किस तरफ इशारा कर रहे है?

विश्व युद्ध के बाद UN का निर्माण हुआ, इंस्टीट्यूशंस, जैसे कि वर्ल्ड बैंक, IMF, नाटो, यूरोपियन समुदाय या यूनियन, G7 इत्यादि, बने। लेकिन इन सभी संस्थाओ की निर्णय लेने की पद्धति पे द्वितीय विश्व युद्ध के विजेता राष्ट्रों (चीन एक अपवाद था) ने कब्ज़ा कर लिया। UN, वर्ल्ड बैंक, IMF पे इन विजेता राष्ट्रों की सहमति के बिना कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता। इन संस्थाओ के द्वारा अमेरिका एवं यूरोप ने अपना पूरे विश्व पर अपना वर्चस्व स्थापित किया।
लेकिन इसी समय आर्थिक वर्चस्व स्थापित करने के लिए इन देशो ने इन्नोवेशन एवं रिसर्च को बढ़ावा दिया। परमाणु शक्ति, राडार, माइक्रोवेव कंप्यूटर, इंटरनेट, जीपीएस, बायोटेक, एंटी-बायोटिक का औद्योगिक स्तर पर निर्माण एवं प्रयोग, स्पेस रिसर्च इसी रिसर्च का परिणाम है।

चूंकि युद्ध में भवन, शहर, रेल, हवाई अड्डा, बंदरगाह, एयरपोर्ट, हाईवे, बिजली संयंत्र इत्यादि ध्वस्त हो गए थे, इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश किया गया जिसके निर्माण से नागरिको को रोजगार मिला; कई अन्य सहायक उद्योगों जैसे कि स्टील, सीमेंट, कार, रेस्टोरेंट, होटल, पर्यटन को भी बढ़ावा मिला। साथ ही, इस निर्माण ने यूरोप में अमेरिकी वस्तुओं के लिए बाजार स्थापित कर दिया।
यही स्थिति कोरोना से उत्पन्न संकट के कारण उत्पन्न हो गयी है। मैं इस संकट में जलवायु परिवर्तन एवं डिजिटल व्यवधान भी जोड़ना चाहूंगा; प्रधानमंत्री मोदी इन दोनों संकट एवं इससे उत्पन्न अवसरों के बारे में भी कई बार अपने विचार रख चुके है।

अमेरिका एवं यूरोप की प्रमुख सैन्य एवं आर्थिक शक्तियां पतन की ओर अग्रसर है। डिजिटल क्रांति ने मैन्युफैक्चरिंग गुड्स के दाम गिरा दिए हैं, लेकिन ज्ञान और तकनीकी पर आधारित उद्योगों (फेसबुक, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न, एप्पल इत्यादि) की तरफ पैसा खींच दिया। अमेरिका एवं यूरोप में जनसमूह की लेबर पर आधारित, निम्न एवं मध्यम तकनीकी वाला मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र लगभग समाप्त हो गया है।
मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र का लाभ चीन, बांग्लादेश, विएत नाम जैसे राष्ट्र ले गए, जब कि ज्ञान एवं तकनीकी पर आधारित सेवा क्षेत्र का आंशिक लाभ भारत ने खींच लिया।
लेकिन कोरोना के कारण विकसित देश अपनी सप्लाई चेन (जैसे कि कंप्यूटर, टीवी, जूते, बिजली के उपकरण, कपड़े, खिलौने, फर्नीचर, बर्तन, मशीन, कार इत्यादि एवं उनके पार्ट्स) को एक देश (चीन) में सीमित नहीं देखना चाहते। अतः वे अपनी सप्लाई चेन को अन्य देशो में मूव कर रहे है।

110 लाख करोड़ के निवेश से बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर (बिजली संयंत्र, गृह निर्माण, सभी घरो में नल से पानी, सड़क, रेल, पानी, बंदरगाह, स्वच्छता, एयरपोर्ट, बैंकिंग, तकनीकि संस्थान, इत्यादि) निर्माण की प्रक्रिया से ही सहायक उद्योगों जैसे कि कच्चे तेल के उत्पाद, ईंट-गिट्टी, खनिज, स्टील, सीमेंट, परिवहन, कार, रेस्टोरेंट, होटल, पर्यटन, ठेकेदारी, सेवा और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र को भी बढ़ावा मिलेगा जिससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, राष्ट्र में समृद्धि आएगी।
डिजिटल युग में इंटरनेट के मामले में विश्व में भारत आज दूसरा सबसे बड़ा देश है। हमारे शहरो की तुलना में गाँवों में अधिक इंटरनेट यूजर है। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2020 में Global Internet of Things (सारी मशीनो, वाहनों, घरेलू उपकरणों को इंटरनेट से कनेक्ट करना जिसमे इसके मध्य डेटा एक्सचेंज होगा) मार्केट में भारत की हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत थी। ये लगभग 20 लाख करोड़ रुपए का बाजार है। digitization, analytics, e-mobility और block-chain जैसी नई टेक्नॉलॉजी नए बिजनेस के अवसर पैदा कर रही है जिसका लाभ भारत को उठाना चाहिए।

अंत में, तापमान बढ़ने के कारण रूस, स्वीडेन, नॉर्वे, फ़िनलैंड, आइसलैंड, चीन एवं कनाडा में लाखो एकड़ की विशाल भूमि इसी दशक में कृषि योग्य हो रही है। वहां पर उगने वाला अन्न भारत की उपज से सस्ता होगा। गर्म देशो में पानी की कमी के कारण हाइड्रोपोनिक तकनीकी से खेती शुरू हो गयी है जिसमे विशाल बहुमंजिला संरचना में पानी में कुछ द्रवित खाद डालकर फल-तरकारी उगाई जा रही है।

भारत में बिजली के क्षेत्र में वन नेशन वन ग्रिड स्थापित कर दिया गया है। सोलर पावर सहित renewable energy के मामले में आज दुनिया के पांच टॉप देशों के अंदर भारत ने अपनी जगह बना ली है। इंटरनेशनल सोलर अलायन्स के रूप में प्रधानमंत्री मोदी ने भविष्य की एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्था को भारत में खींच लिया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रत्येक राष्ट्र को एक वोट प्राप्त है। तभी विश्व के छोटे-छोटे देशो को कोरोना वैक्सीन भेजकर प्रधानमंत्री मोदी भारत के प्रति उनके समर्थन एवं वोट को खींच रहे है जिसका लाभ अंतर्राष्ट्रीय राजनीती में दिखाई देगा।

अंत में, मैं प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा उद्धृत एक श्लोक से इस लेख को समाप्त करूँगा।
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रवि-शन्ति मुखे मृगाः।।

यानि, उद्यम से ही कार्य पूर्ण होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं।
सोते हुए शेर के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते हैं।

साभार – अमित सिंघल जी

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