महाभारत के वन पर्व के अंतर्गत अध्याय 313 में यक्ष और युधिष्ठिर के बीच हुए संवाद का बड़ा ही रोचक वर्णन है। संवाद के क्रम में यक्ष ने युधिष्ठिर से कई प्रश्न किए, उनमें से एक प्रश्न यह भी था कि संसार में सबसे बड़े आश्चर्य कौ बात क्या है ? युधिष्ठिर ने इस प्रश्न के उत्तर में कहा कि हर रोज़ आँखों के सामने कितने ही प्राणियों क्री मृत्यु हो जाती है, यह देखते हुए भी इनसान स्वयं के नहीं मरने के सपने देखता है । संसार का यही सबसे बड़ा आश्चर्य है । संत कबीर ने भी कहा है…

काल जीव को ग्रासई, बहुत कहा समुझाय ।
कहै ! कबीर में क्या करूँ, कोई नहीं पतियाय । ।

अर्थात संत कबीर कहते हैं कि मैंने बहुत प्रकार से समझाकर कहा कि एक दिन हर प्राणी को काल पकड़ेगा, परंतु मैं क्या करूँ, कोई मेरी बात पर विस्वास ही नहीं करता।

सचमुच हम हर दिन लोगों को मरते हुए देखते हैं, उन्हें श्मशान में जाते हुए देखते हैं, स्वयं भी श्मशान में आतेजाते रहते हैं, कब्रिस्तान में कईं लोगों की कब्रें देखते हैं, कुछ नए लोगों के लिए नई कब्रें बनते हुए भी देखते हैं, पर फिर भी हम यही सोचते हैं कि हम तो मरेंगे नहीं । मृत्यु अटल है, इसे टाला नहीं जा सकता, इससे बचा नहीं जा सकता, पर फिर भी हम इस अटल सत्य को भूलने भुलाने का प्रयास अपने जीवन में करते रहते हैं । हमारी यही भूल हमसे हमारे जीवन में न जाने ऐसे कितने अशुभ और पापपूर्ण कर्म कराती है, जिससे हमारा जीवन निराशा से भर जाता है, जीवन नीरस हो जाता है, निरर्थक हो जाता है ।

ऐसा लगता है मानो हमारे जीवन में मधुरता रही ही नहीं । रावण, कस, कुंभकर्ण से लेकर औरंगजेब जैसे क्रूर शासकों ने अपने जीवन में न जाने कितने अत्याचार, अमानवीय कृत्य किए । शायद यही सोचकर कि वे स्वयं कभी मरेंगे ही नहीं । आज भी विभिन्न देशों के सार्वजनिक जीवन से जुड़े हुए लोग सत्ता के नशे में, न जाने कितने क्रूर कर्म व कुकर्म करते हैं । नित्य नए भ्रष्टाचार करते हैं और अंतत: अपने ही बने हुए जाल में उलझते हैं, फँसते हैं और फिर जीवन भर बिलखते और सिसकते हैं। यह सब कुछ इसलिए हुआ; क्योंकि उकोंने कभी अपनी मृत्यु को याद ही नहीं रखा, उन्होंने यह सोचा ही नहीं कि यह जीवन नश्वर है, यह देह नश्वर है और मृत्यु एक दिन उनसे उनका सब कुछ छीन लेगी । जिन लोगों के लिए धन, दौलत, ऐश्वर्य ही सब कुछ है । ऐसे लोगों का जीवन सचमुच भय से भरा हुआ होता है, आशंकाओं से भरा हुआ होता है । उनके अपने ही कर्म उन्हें हर पल डराते हैं, सताते हैं । सपने में भी वे भय और उलझन में होते हैं । समस्त भौतिक वैभव एवं साधनों के बीच होते हुए भी, भोगते हुए भी वे हमेशा डरे,सहमे और ठिठुरे हुए होते हैं । ऐसे लोग बाहर से भले ही अमीर और आनंदित दिखते हों, पर वे अंदर से कंगाल व दुखी होते हैं । उनके प्रभाव भय से बाहर से उनकी जय-जयकार भले ही हो रही हो, पर उनके भीतर हाहाकार मचा हुआ होता है । वे आत्मबल व आत्मिक आनंद की जगह आत्मग्लानि से भरे हुए होते हैं; क्योंकि वे अपने क्रूर कृत्यों च कुकर्मों से परिचित होते हैं, इसलिए उन्हें उनका अंतस् हर पल दुत्कारता और धिक्कारता है । अंत में ऐसी ही मन:स्थिति, भय, पश्चात्ताप, ग्लानि व पीड़ा के साथ वे इस संसार से विदा हो जाते हैं । भला ऐसा जीवन भी कोई जीवन है ? जिस जीवन में कोई आनंद न हो, उल्लास न हो, फिर वह जीवन कैसा ? पर जीवन में ऐसा आनंद, उल्लास व मधुरता का अमृत तभी संभव है, जब हम हमेशा धर्म की राह पर चलें, सच्चाई की राह पर चलें, अध्यात्म की राह पर चलें, नेकी की राह पर चलें । इन राहों पर चलना तभी संभव है, जब हमें यह बोध हो कि हमारा जीवन नश्वर है, मृत्यु अटल है, आत्मा अमर है और हमारे द्वारा किए गए कर्मों का फल मिलना भी सुनिश्चित है । इस प्रकार मृत्यु का स्मरण बने रहने से हम बुरे कर्म, पाप कर्म करने से बचेंगे । तब हम अपने जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य मोक्ष, मुक्ति को हर पल याद रख सकेंगे । तब धर्म के मार्ग पर, सत्य के मार्ग पर चलते हुए हम अपने जीवन को सचमुच ही आनंद व उल्लास के अमृत से भर सकेंगे । स्वयं के जीवन के साथ-साथ दूसरों के जीवन में मधुरता भर सकेंगे और स्वयं के साथ-साथ दूसरों को भी निहाल कर सकेंगे । तब हम सचमुच अपने जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य को भी प्राप्त कर सकेंगे । तय हमारा जीवन बोझिल होगा ही नहीं । हम स्वयं के लिए बोझ होंगे ही नहीं । हम समाज के लिए, देश के लिए बोझ होंगे ही नहीं । तब हम जहाँ भी होंगे, समस्या नहीं, समाधान ही होंगे । तब हमारा जीवन सचमुच निर्मल और निर्विकार होगा और तब मृत्यु भी हमारे लिए मरण नहीं, महोत्सव होगी । मृत्यु का स्मरण रखना क्यों आवश्यक हैं ?

इस संबंध के एक बहुत ही रोचक कथा है । एक बार संत एकनाथ जी के पास एक व्यक्ति आया और बोला’ ‘ नाथ ! आपका जीवन तो आनंद, उल्लास व मुधस्ता से भरा हुआ है, पर हमारा जीवन अशांति और ग्लानि से क्यों भरा हुआ है ? भगवत्। हमारे जीवन में शांति, आनंद, उल्लास व मधुरता का अमृत क्यों नहीं है ? हम क्यों इनसे वंचित हैं ? हमें क्यों काम, क्रोध, मद, मोह, दंभ, दुर्भाव, द्वेष हर पल सताते और रूलाते हैं ? हे प्रभु । आप कोई ऐसा उपाय बताएँ जिससे हम भी आनंद को प्राप्ति कर सकें ?” संत प्रवर बोले-‘ ‘ मैं तुझे वह उपाय तो बता सकता था, किंतु तू तो अब आठ ही दिनों का मेहमान है, अत: जैसे अब तक अपना जीवन व्यतीत किया है, वैसा ही जीवन व्यतीत कर । ‘ ‘ उस व्यक्ति ने जैसे ही सुना कि वह अब अधिक दिनों तक जीवित न रहेगा, तो वह उदास हो गया और तुरंत ही अपने घर लौट आया । घर में वह पत्नी से जाकर बोला “मैँने तुम्हें कई बार कष्ट दिया है । मुझे क्षमा करो ।” फिर वह बच्चों से बोला ‘ बच्चों मैंने तुम्हें कई बार पीटा है, मुझें उसके लिए माफ़ करो ।” पड़ोसियों व मित्रों के पास जाकर भी उसने क्षमा माँगी । इस तरह जिस-जिस व्यक्ति के साथ उसने दुर्व्यवहार किया था, उन सबके पास जाकर उसने माफी माँगी । इस तरह आठ दिन व्यतीत हो गए और नयें दिन वह संत एकनाथ जी के पास फिर पहुँचा और बोला”प्रभु ! आठ दिन तो बीत गए । मेरी अंतिम घड़ी के लिए कितना समय शेष हैं?”

संत एकनाथ जी मुस्कराए और बोले…’ ‘ तेरी अंतिम ‘ घड़ी कब आएगी, मृत्यु कब आएगी, यह तो भगवान ही जानता है, परंतु मुझे यह तो बता कि ये आठ दिन तेरे कैसे व्यतीत हुए, भोग-विलास में मस्त होकर तूने आनंद तो प्राप्त किया ही होगा ‘ ‘ वह बोला…’ ‘ क्या बताऊँ नाथ, मुझे इन आठ दिनों में मृत्यु के अलावा और कोई चीज दिखाई नहीं दे रही थी । इसलिए मुझे अपने द्वारा किए हुए सारे दुष्कर्म, कुकर्म, पापकर्म स्मरण हो आए और उसके पश्चात्ताप में ही वह अवधि बीत गई । ‘ ‘ संत एकनाथ बोले…’ ‘ तो मित्र तूने जिस बात को ध्यान में रखकर ये आठ दिन बिताए हैं, हम साधु लोग इसी बात को अपने सामने रखकर सारा जीवन बिताते हैं । ध्यान रखो, अपनी यह देह क्षणभंगुर है और अंतत: इसे मिट्टी में मिलना ही है । अत: इसका गुलाम होने की अपेक्षा परमेश्वर की संतान होना ही श्रेयस्कर है । प्रत्येक के साथ समान भाव रखने में ही जीवन की सार्थकता है और यही कारण है कि यह जीवन हमें मधुर मालूम होता है; जबकि तुम्हें असहनीय । ‘ ‘ ‘ उस व्यक्ति को जीवन का सच समझ में आ गया । वह नई ‘ उमंग के साथ, नई ऊर्जा के साथ, नई दृष्टि के साथ अपना जीवन जीने लगा ।

अत: मृत्यु तो अवश्यंभावी है । इसलिए हम भी इस नई जीवन-दृष्टि के साथ क्यों न अपने जीवन को आनंद से भर लें ? वैसे ही, जैसे राजा परीक्षित को जब ज्ञात हुआ कि आज के सातवें दिन ही तक्षक नाग के डसने से उनकी मृत्यु होगी, तो वे तुरंत ही संत की शरण में गए शुकदेव जी की शरण में गए शुकदेव जी ने उन्हें भागवत कथा का अमृत पिलाकर सदा के लिए भयमुक्त कर दिया । तक्षक नाग ने सातवें दिन आकर उम्हें डसा जरूर – मृत्यु उनके शरीर की हुई ज़रूर, पर तब तक तो उनकी आत्मा भागवत कथा के प्रकाश से प्रकाशित हो चुकी थी। उनकी आत्मा परमात्मा के परम प्रकाश व परम प्रेम में निमग्न हो चुकी थी, विलीन और विसर्जित हो चुकी थी।

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