और क्या बताएं कि मंदिर का मतलब क्या है।

Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on telegram
Share on whatsapp

मूर्ति और मंदिर। इन दोनों ने ही हिन्दू धर्म का मौजूदा स्वरूप गढ़ा है। इसमें शूद्र वर्ण और वैश्य वर्ण का योगदान सर्वाधिक है। इसके कर्मकांड से ब्राह्मण जोड़े गए और क्षत्रियों ने राज्य स्थापना और उसके विस्तार का एक मापदंड इसे भी बनाया। मंदिर का अर्थशास्त्र शूद्र और वैश्य के जीवन संचालन का मेरुदंड। एक मंदिर के शिल्प का काम पूरा हुआ नहीं कि दूसरे का शिल्प बनना शुरु। जहां जिसके राज्य में शिल्पियों, श्रमजीवियों के हाथ न थकें और कभी काम के अभाव में ना रुकें, हर वीथिका, हर भूमि जहां मंदिर, कुंड, तालाब, वॉव, पथ, राजपथ, दुर्ग और महलों की अटारी से सजी-संवरी दिखती और चमकती रहे, हर शिखर पर स्वर्ण दमकते रहें, वह ही सबसे श्रेष्ठ राजा और उसके राज्य का चक्रवर्तित्व देखना है तो उसके द्वारा निर्मित स्वर्ण शिखर युक्त मंदिर देखो। पूरा भारत मंदिरों-स्तूपों-चैत्यों, शिक्षा के गुरुकुलों, तक्षशिला-नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों और नदियों के किनारे घाटों से गढ़ता, आगे बढ़ता, राजकोष से समृद्ध होता चला गया तो शिल्पी संघों, धर्म या धम्म संघों, श्रेष्ठियों यानी कुबेरों और क्षत्रियों के बाहुबल का ही चमत्कार है। जो समस्त वर्णों और समस्त समाज को जोड़कर न रखे तो फिर वह मंदिर कहां, उसका शिल्प और सौन्दर्य कैसा। कला भी सुरक्षित और परिधान भी, वतन भी सुरक्षित और धन-धान्य भी, समय की प्रतिभा को सदा निखारते, संवारते चलना यानी मंदिर देखना।

समाज में, देश में प्राचीन काल से शिल्प कला को, तकनीकी को, स्थापत्य विद्या को, वास्तुकला को, उससे जुड़ी इंजीनियरिंग को और वित्त यानी धन के प्रवाह को भी मंदिर चलायमान रखते रहे थे और आज के युग में भी कुछ मात्रा में रखते हैं। प्रश्न है कि मंदिर क्यों जाना। तो इसका उत्तर समझना आज के समय में बहुत ही कठिन है। क्यों कठिन है। क्योंकि न वह समय ही रहा और न ही वो मंदिर ही रहे जिन्हें देखने के लिए इंसान लहालोट हुआ जाता था।

मंदिर देखना यानी उसका शिल्प देखना। मंदिर देखना यानी उसकी शैली देखना। मंदिर देखना यानी उसका पूरा वास्तु विधान देखना। मंदिर देखना यानी आकाश को छूता, गगनचुंबी स्वर्ण और रजत से मंडित उसका शिखर वितान देखना। मंदिर देखना यानी उसके अंग-प्रत्यंग में रची-बसी सूक्ष्म कला को देखना। मंदिर देखना यानी उसे निर्मित करने वाले कारीगरों के बारीक हुनर को देखना। मंदिर देखना यानी छेनी-हथौड़ी-श्रमसीकर का कमाल देखना। मंदिर देखना यानी उसके ईष्ट की मंत्रमुग्ध कर देने वाली हर दरो-दीवार पर अंकित मुस्कान देखना। उस पर नृत्य करता मदमाता श्रृंगार देखना। मनुष्यों का, उससे जीवन से जुड़े जीवों का, जन्तुओं का पत्थरों पर जीवंत कल्लोल देखना यानी मंदिर देखना। जिसकी दीवारों पर फैला जीवन रस इतना प्रगाढ़ कि ह्रदय में हुलास भरने वाला, भीतर से हिलोर भर देने वाला चितचोर दृष्य देखना यानी मंदिर देखना। मंदिर देखना यानी मनुष्य जीवन के चौबीस घंटों, बारह महीनों के जीवन चक्र को उसकी परिक्रमा करते करते ही देख लेना। मंदिर देखना यानी अपना विहान देखना और शरीर का अवसान देखना। मंदिर देखना यानी अखंड ज्योतित आत्मदेव को बस देखते ही रहना। जीवन की निरंतरता को देखना, शरीर की नश्वरता को देखना। भारत के मंदिर की परंपरा बड़ी निराली है, उसे समझने के लिए दिव्य और पावन दृष्टि चाहिए, जिनके मन में दूषण है, अपवित्रता है, कला की कोई समझ नहीं है, जो कला को व्यर्थ की वस्तु मानते हैं, ऐसा कलाविहीन लोगों के समझ से मंदिर की परिधि बहुत बाहर है।

मंदिर देखना यानी उसके विधान, कर्मकांड, मंत्रोच्चारण और त्रिकाल उसकी उपासना विधि को भी देखना। मंदिर देखना यानी समय की घंट ध्वनि की निरंतर सुनते रहना। मंदिर यानी नियमों की लयबद्ध यात्रा पर आधारित जीवन का बढ़ते जाना, जीवन का एक अनुशासन बन जाना यानी मंदिर हो जाना। मंदिर यानी मन की चंचलता को मिल जाए विराम। मंदिर यानी सब कुछ परमात्मा का, समय सबकुछ उसे अर्पित करने का, जो मिला है,उसे उसकी सेवा में निखारते रहने का। उसकी साधना हेतु कर्म करने के लिए प्राप्त सद्गुणों के संकीर्तन का आंगन खोल देना यानी मंदिर देखना। गर्भगृह के पट खुलने की प्रतीक्षा करना यानी मंदिर देखना। प्रतीक्षा के महत्व को समझना, बारी आने पर ही अपना जीवनपुष्प काल के निर्धारित पथ पर अर्पित करने की नियति की इच्छा को समझना, मंदिर को देखना इतना आसान नहीं, उसे समझ पाना तो और मुश्किल। मंदिर यानी अपने भीतर के योग्यतम की उपासना, मंदिर यानी अपने भीतर के सर्वोत्तम की यात्रा पर चलना, जो नहीं है, जिसकी चाह है, मन के आंगन में जिसका अभाव है, जो मिल जाए तो मानो घट भर जाए, उस परमतत्व को आत्मदेव से मांगना है मंदिर देखना। जो है उसे और भी सुन्दर बनाने का मंत्रोच्चारण है मंदिर देखना। मंदिर यानी जीवों से भरी इस संसार नदी में सब प्रकार के बंधनों से मुक्त होकर विचरण करना। मंदिर देखना यानी वह देखना जो सांसारिक होकर नहीं देखा जा सकता। संसार में डूबा मन जिसे जान नहीं पाता। मन की दहलीज यानी मर्यादा को समझ लेना यानी मंदिर को देख लेना। मंदिर यानी सब मानसिक मलों से मुक्ति, कायिक-वाचिक मल से मुक्ति। मंदिर यानी सारे आश्रव से छुटकारा, मंदिर यानी महाकाल की महानता को जान लेना। म

मंदिर यानी उसके साथ अन्नशाला जहां प्रत्येक को निःशुल्क भोजन प्रसाद के रूप में मिले। भगवान के घर गए और भूखे रहें यह मान्य नहीं उसी प्रकार जैसे भगवान के घर गए और खाली हाथ गए, यह भी मान्य नहीं। जो देने वाला है, वह दे और जो लेने की जरुरत समझता है वह ले ले। मंदिर यानी उसके साथ आयुर्वेदशाला और योगशाला जहां रुग्ण समाज को स्वास्थ्य रक्षा का मंत्र मिले। मंदिर अर्थात मल्लशाला अर्थात अखाड़े जहां व्यायाम हो और युवकों की टोली शरीर गठन कर समाज रक्षा का दायित्व निभाए। मंदिर अर्थात गुरुकुल जहां बच्चों को संस्कार मिलें, वह शिक्षा मिले जिससे लोक में ज्ञान प्रसारित हो। मंदिर यानी प्रार्थना स्थल। व्यक्ति के मन का स्वास्थ्य ठीक रहे और सामूहिकता का बोध भी हो।

तेरे स्व की स्मृति हैं मंदिर। उसक मंदिर की गंदगी तेरे मन के मलिन हो जाने का सबसे बड़ा प्रमाण भी हैं। देश कैसा है और उसका समाज कैसे है, मंदिर और उसके बगल में बहने वाली नदी देखकर कोई भी जान लेगा। समाज आलसी है या क्रियाशील है, समाज ठहरा है या उन्मुक्त होकर जीवन आनंद के साथ पग आगे बढ़ा रहा है, वो मंदिर देखते ही समझ लेगा कोई भी,जो थोड़ी भी समझ रखता है। देश में कला का आदर है या निरादर, बता देंगी मंदिर के शिखर से गूंजने वाली ध्वनि। कला-उत्सव में समाज जीता है या केवल सारा समाज नकली-थकी और बिकाऊ चीजें लेकर कंधे पर ढो रहा है, सबकी गवाही मंदिर देते रहे हैं, दे रहे हैं। वीरता-बल-विक्रम-शौर्य वाले लोग किसी देश में हैं भी या सबके सब केवल कायरों और दरिद्रों की जमात में बदलते और अवसाद में बैठते चले गए हैं, ये तेरे मंदिर की हालत बता देगी। कुछ भी कठिन नहीं है जानना। किसी देश के इतिहास का हाल क्या है, वर्तमान कैसा है और भविष्य किसी प्रदेश के समाज का क्या होने वाला है, सब मंदिर देखते ही और देखकर भी आप समझ सकते हैं।

तो सोचिए कि मंदिर देखने का मतलब क्या होता है। सबसे बढ़कर मंदिर यानी देश और लोक की कला, जहां गीत-संगीत और नृत्य ऐसे मिलें और रस घोलें की तन-मन सुध-बुध खो बैठें। मन के मंदिर के भीतर के परमात्मा को जगाने की साधना का नाम है मंदिर। शरीर को मंदिर ही तो माना है परंपरा ने। उस शरीर को साक्षात जब भूमि पर पत्थरों से उकेरा जाता है तो मंदिर की कृति बनती है। उसके गर्भगृह में प्राण प्रतिष्ठित देवता उसी तरह वास करते हैं जैसे शरीर के गह्वर में प्राण देवता। अपने शरीर के भीतर के सत्य को जानना भी है मंदिर हो जाना। बहुत कुछ और भी है मंदिर। यह भारत भी मंदिर है और शरीर भी, यह धराधाम मंदिर हो जाए जहां हर कोई शिल्पी हो, योगी हो, संगीतज्ञ हो, अन्न से झोली भरने वाली अन्नपूर्णा पंरपरा हो, जहां श्रम और श्रमिक को भर पेट प्रसाद हो, उसके भीतर की यात्रा पर ले जाने वाला कोई मंत्र हो, गीत हो-संगीत हो। इतना हो तभी मंदिर है। नहीं तो मंदिर नहीं हैं, केवल उस मंदिर परंपरा के खंडहर ही समझो। याद रखो जब तुम्हारे पुरखे सभ्यता के उत्कर्ष पर थे तभी इन मंदिरों के शिखर उठने शुरु हुए, याद रखो जब तुम जमीन पर औंधे मुंह गिरे थे तब तुम अकेले नहीं गिरे थे, तुम्हारे ये शिल्प और समाज के सारे स्वायत्त स्तंभ भी धराशायी हो गए थे। तुम हो इसीलिए मंदिर हैं, तुम नहीं हो तो फिर कौन सा मंदिर। केवल पत्थरों का संकुल शेष, एक गुम विरासत का अंधेरा पक्ष। इसलिए मंदिर देखना यानी पुरखों के पराक्रम को देखना, मंदिर देखना यानी अपने आत्मबल को आजन्म आवाज देते रहना। निरंतर अभ्यास और परिश्रम, निरंतर आत्म अनुसंधान है मंदिर देखना।
गुलाम देश में मंदिर और उसकी परंपरा पर ही तो सबसे ज्यादा चोट होती रही। क्या कोई समझे कि मंदिर क्या हैं, क्यों हैं, किसलिए हैं। तुम्हारे पराक्रम का स्वेद और तुम्हारे अवसान के आंसू दोनों ही तो इसकी नींव में समाए हैं। तुम और तुम्हारा स्व है तो ये शिखर भी रहेंगे और जब तुम और तुम्हारा स्व ही शेष नहीं है तो ये भी नहीं रहेंगे। इदमपि न तिष्ठेत। काशी में गंगा किनारे परंपरा से निर्मित प्रत्येक भवन पर यही लिखा है कि इदमपि न तिष्ठेत कि यह भी नहीं रहेगा। मतलब है कि जबतक तुम्हारा स्व रहेगा यह भवन भी रहेगा, यह भुवन रहेगा और जब तुम्हारा स्व कहीं अनंत आकाश में उड़ जाएगा तो यह नहीं रहेगा। तुम हो तो है, नहीं हो तो नहीं है। और क्या बताएं कि मंदिर का मतलब क्या है।

लेखक-प्रो. राकेश कुमार उपाध्याय

Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn
Share on telegram
Telegram
Share on whatsapp
WhatsApp

Read More

Rakesh Upadhyay

भारतीय स्थापत्य कला और पाश्चात्य स्थापत्य कला के ये दो नमूने हैं।

पीसा की मीनार इटली में और भारत के मध्य प्रदेश में कंदरिया महादेव। खजुराहो में कंदरिया महादेव का यह विशाल मंदिर 100 फुट से अधिक

Read More »

Multiplicity of Gods

The viewpoint which is frequently misconstructed is the quantity of divine beings in Hinduism. Numerous individuals, including Hindus and furthermore devotees of different religions, believe

Read More »

गुलामी और पराधीनता ने कैसे कैसे दिन इस देश को दिखाए हैं, सोचो, समझो और जागो।

।।श्री गणेशाय नमः।। हरिओम तत्सत।। भारत में प्राचीन काल से पशुपालन की वैज्ञानिक पद्धति प्रचलित रही है। प्रत्येक अहिंसक और नित्य के जीवन के लिए

Read More »

Vedic Mantras and Sounds

The Vedas however are not as well known for pre- senting historical and scientific knowledge as they are for expounding subtle sciences, such as the

Read More »
Brahma Logo Bhagwa