इस कठिन काल में भवानी की अर्चना का महत्व है। माता सारे अंधेरे दूर करती है, सारे भ्रम छांट देती है, अहंकार को गला-मिटाकर नष्ट कर देती है, गुरुर का सुरुर सर से उतारकर सब को एकभाव से निर्मल परिमल कर देती है। माता की शरण जाने से सारे संताप मिट जाते हैं। माता जगत जननी है, जगत की पालनहार। माता नहीं हो तो पिता की संकल्पना भी नहीं हो सकती। सेमेटिक संसार तो परमात्मा को पिता मानकर जेंडर में बांधता है लेकिन भारतीय परंपरा परमात्मा को मातारूप देखती है, परमात्मा के जितने सांसारिक रूप हैं, सबको मातारूप से सृजित बताकर जेंडर-श्रेष्ठता और जेंडर-बोध के सारे संभ्रम, विवाद और झगड़े को ही निपटा देती है।

इस संसार के समस्त सभ्यतामूलक विमर्श में केवल और केवल सनातन वैदिक भारतीय परंपरा की ही मान्यता है कि माता के गर्भ में भगवान पलते हैं। माता से ही परमात्मा हैं और परमेश्वरी ही हैं आदिशक्ति जगतजननी भवानी। परमेश्वर और परमेश्वरी एकात्म हैं, अद्वैत हैं, अभिन्न हैं, अनिवर्चनीय और अवर्णनीय हैं। उसके कारण है यह भव अर्थात होना अर्थात भवसागर अर्थात संपूर्ण सृष्टि प्रक्रिया उत्पन्न है, सृजित है और निरंतर लय की ओर बढ़ रही है। परमेश्वरी से संयुत प्रत्येक रूप में परमात्मा के दर्शन यही भारत के भक्ति आंदोलन का विस्तार है। यही है जयभवानी का मंत्रजाप,जिसे जपते, मथते भारत का भावलोक पनपा और पुष्पित-पल्लवित हुआ है।

सबै भूमि गोपाल की जिसमें जनता जनार्दन रूप है। लोक और उसका समाज इसमें सबसे ऊपर है। राज्य और राजनीति से भी ऊपर। राज्य केवल भारत के भावलोक का एक उपकरण है। उपकरण जबतक ठीक काम करेगा तो उसे चलाते रहेंगे, सही तरीके से काम नहीं करेगा तो उसे मुक्तभाव से गंगा में प्रवाहित कर नवीन उपकरण पैदा कर देना भी भारत का लोक परंपरा से जानता है। सनातन विधि में हस्तक्षेप का अधिकार राज्य को नहीं है। यही कारण है कि न कोई मंदिर के देवता को जब्त कर सकता है और ना ही उस पर आदेश चला सकता है। भारतीय विधि परंपरा भी इसी कारण से मंदिर के प्राणप्रतिष्ठित देवता को जीवंत इकाई मानकर उसके समस्त अधिकारों के समक्ष अपना सर नवाती है। इसी कारण से मंदिर के देवविग्रह की इच्छा अनुसार किसी को भी न तो मंदिर दर्शन से किसी को रोकने का अधिकार है और ना ही किसी को परंपरा से चली आ रही किसी परमेश्वर की पूजनविधि को खंडित करने की शक्ति प्राप्त है। सनातन मंदिर सनातन व्यवस्था और सनातन भाव से सनातनी व्यवस्था के अन्तर्गत ही चलने चाहिए।

सनातन धर्म की परंपरा और उसके मंदिरों व संपत्ति पर जो कथित सेक्युलर राजनीति गिद्ध दृष्टि लगाए बैठी है, उसे समझ लेना चाहिए कि उसकी शक्ति वहीं तक है जहां से मंदिर की परिधि प्रारंभ हो जाती है। राजनीति के जो आधुनिक ‘चौहान’ बने हैं जिन्होंने पृथ्वी पर राज करने का जन्मसिद्ध अधिकार समझ कर खुद को ही असली ‘पृथ्वीराज चौहान’ होने का भ्रम पाल रखा है, उन पूर्व मुख्यमंत्री महोदय को ध्यान रखना चाहिए कि इस पूर्व को सदा के लिए भूतपूर्व बनाए रखने की अभूतपूर्व सत्ता और शक्ति मंत्र में समाहित मानी गई है। मंत्र किसके मन से उपजते हैं, और कौन मंत्र की शक्ति को समझकर उसकी दिन-रात साधना करता रहता है, भारत के इस सनातन विधान को न समझ पाने की भूल मत करिए नहीं तो जो कुछ बचा-खुचा है वह सब कुछ भी शीघ्र नष्ट हो जाएगा।

याद रखिए नियति का खेल, जिस भूमि से भारत में भक्ति आंदोलन का श्रीगणेश हुआ था, जिस पावन भूमि श्रीपेरामबदूर में भगवद् स्वरूप रामानुजाचार्य ने ईस्वी सन 1017 में जन्म लिया था, जिस भूमि से भक्त परंपरा की आंधी उस विकट काल में भारत में उठी जबकि दिल्ली से सोमनाथ तक कहर ही कहर भक्तों पर बरस रहा था, जिन कारणों से भक्त परंपरा पर आजतक राजनीतिक कुटिलजन टीका-टिप्पणी करते हैं, उन कमभक्तजनों को सदा याद रखना चाहिए कि भक्त परंपरा को जन्म देने वाली उसी श्रीपेरामबदूर की मिट्टी में भारत की राजनीति में सेक्युलर हवा भरने वाले और राम की परंपरा और अस्तित्व को चुनौती देने वाले परिवार के वटवृक्ष की मिट्टी सदा के लिए समाहित हो चुकी है। इसलिए अगर श्रीपेरामबदूर की मिट्टी के प्रति यदि मन में जरा भी भक्ति और आदर है तो उससे पैदा हुई भक्त परंपरा और श्रीरामानुजाचार्य के भक्ति सिद्धांतों के प्रति अक्षरशः आदर करना भी उस परिवार और उसके चाहने वालों को सीखना ही चाहिए। और केवल एक परिवार की ही बात नहीं है, राजनीति करने वाले जितने परिवार हैं भारत में, सभी को परंपरा का आदर करना सीखना चाहिए क्योंकि यह भारत की पहचान है। इसी में सबकी भलाई है।

पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी बार बार इन पक्तियों को दोहराते थे कि
यह परंपरा का प्रवाह है-कभी न खंडित होगा,
पुत्रों के बल पर मां का मस्तक मंडित होगा।
पूत कपूत है जिसके रहते मां की दीन दशा हो,
शत भाई का घर उजाड़ जिसका महल बसा हो।

याद रखिए कि यह देश परंपरा और आस्था का देश है, मंत्रों मे बड़ी शक्ति है, इन मंत्रों का ही परिणाम था कि काशी-मथुरा-अयोध्या पर कुटिल आक्रमण करने वालों के वंशज बूंद-बूंद पानी को तरसते हुए इतिहास की धारा में विलीन हो गए, काशी-मथुरा-अयोध्या के प्राणदाता की परंपरा आज भी सुरक्षित है, जस की तस है, लेकिन उसे तोड़ने वाले सदा के लिए मटियामेट हो गए। परंपराओं से खिलवाड़ कदापि उचित नहीं, राजनीति के लिए तो कदाचित उचित नहीं।

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