संस्कृत के महत्वपूर्ण धातु रूप ‘भू’, ‘भव‘ और ‘अस्’ का अर्थ है होना। उसी प्रकार से जैसे अंग्रेजी के BE और being शब्द से होने का अर्थ निकलता है। संस्कृत के ‘भव’ और ‘अस्’ धातु ने अंग्रेजी के VERB या क्रिया रूप को मौलिक आधार प्रदान किया, यह सुनकर संभवतः आप हैरत में पड़ जाएंगे। जिन्हें संस्कृत का ज्ञान नहीं है, उन्हें तो बिल्कुल ही अविश्वसनीय लगेगा किन्तु यह सत्य है कि भव और अस धातु का अंग्रेजी के be, am, is, are, was और were से संपूर्ण रिश्ता है। किस आधार पर यह संबंध है, है भी कि या नहीं है? तो इसका उत्तर ऑक्सफोर्ड शब्दकोश से प्राथमिक रूप से मिलता है।

ऑक्सफोर्ड के पुराने प्रामाणिक अंग्रेजी शब्दकोश में BE की उत्पत्ति संस्कृत के ”भव” धातु से ही मानी गई है हालांकि इंडो-यूरोपियन लिखकर कुछ नकार का भाव भी इसमें दिखाई देता है। लिखा है कि-the Indo-European verb with stem base of Sanskrit ‘bhu’.। इसमें लिखा है कि ग्रीक में इसे phu तो लैटिन में fu, ओल्ड इंग्लिश में beo और beon और जर्मन में बौ कहा गया है। संस्कृत में भव और जर्मन में बौ ! है न रोचक समानता। इस समानता का कारण संयोग नहीं है बल्कि वो जड़ें हैं जो संस्कृत से बहुत भीतर से जुड़ी हुई हैं। जर्मनी के विद्वान अपना प्राचीन रिश्ता संस्कृत से मानते हैं लेकिन अंग्रेजी विद्वानों के सम्मुख भ्रम बना रहता है। चूंकि अंग्रेजी कई भाषाओं के मिश्रण से निर्मित हुई इसलिए अंग्रेज अपने शब्दकोश के निर्माण में संस्कृत अर्थात भारतीय परंपरा के मौलिक योगदान को सीधे तौर पर स्वीकार करने से बचते दिखाई देते हैं।

लेकिन यहां केवल शब्दकोश का मामला ही नहीं है। भाषा को जिन शब्दों से ढांचा मिलता है, क्रिया रूप के जो सबसे मौलिक शब्द माने जाते हैं, जिनके बगैर बोलना ही संभव नहीं, वह शब्द अंग्रेजी में संस्कृत से गए हैं, यह जानना सुखद लगता है। हमारे विश्वविद्यालय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को अंग्रेजी में जिन संक्षिप्त अक्षरों से जाना जाता है, वह BHU जो शुद्ध रूप में “भू” कहा जाएगा, यह ‘भू’ शब्द ही अपने धातु रूप में अंग्रेजी क्रिया रूप की आधारभूमि बनकर खड़ा है। अंग्रेजी भाषा परंपरा का प्राणदाता अगर कोई शब्द है तो वह संस्कृत का ”भव” और ”अस” धातु रूप है।

ऊपरी तौर पर जो अर्थ ”भू” या ”भव” धातु का संस्कृत में है वही अर्थ be और उसी से जुड़े और निकले is, am और are का है। भूतकाल में यही be was और were में परिवर्तित हो जाता है। कैसे बदलता जाता है, इसका पूरा व्याकरण है। यहां हम इसी पर कुछ चर्चा करेंगे।

Am शब्द संस्कृत के अस्मि से उत्पन्न हुआ। अस्मि यानी हूं। अस्मि से ही अस्मिता शब्द आया है जिसके मायने किसी के परिचय और पहचान से है। यही अस्मि शब्द स्लावियन परंपरा के JESMI जेस्मि, लिथुआनियन में एस्मि शब्द से लैटिन के इस्मी, जर्मन के एज़मी से होते हुए ओल्ड नॉर्स में एमि से गुजरते हुए AM होकर अंग्रेजी भाषा में सम्मिलित हो गया।

IS:यही बात IS क्रिया रूप शब्द के साथ है। Is यानी इज़ शब्द भी स्लावियन परंपरा से ग्रीक, लैटिन, जर्मन होते हुए अंग्रेजी में आया। संस्कृत में जिसे अस्ति कहा गया है, जिसका अर्थ किसी के अस्तित्व के रूप में ‘है‘ यानी होने के रूप में जाना जाता है। अर्थात जो संस्कृत में अस्ति है, उसे ही ग्रीक में एस्ति, लैटिन में एस्त और स्लावियन में इस्त और अंग्रेजी में इस is या इज़ कहा गया है। अस धातु का यही अस्त और अस्ति अपने होने के अर्थ के साथ फारसी में भी ज्यों का त्यों विद्यमान है।

WAS:अंग्रेजी का was शब्द संस्कृत के आसीत् और कुछ स्रोतों में वसति का अपभ्रंश बनकर अंग्रेज जाति के पास पहुंचा। आसीत का मतलब है था और वसति का मतलब है रहना या समय बिताना। ओल्ड जर्मन में इसे वासात, वासातन या वासानन और ओल्ड सैक्सोन में वेसान, फ्रीजियन में वसात और कुछ स्रोतों मे वासीत कहा कहा गया है। इसी में से पहले wes और उसके बाद was का जन्म हुआ। अब प्रश्न है कि इज़ is और वॉज़ was के ये बहुवचन are और were कहां से आए। आइए इसका भी रहस्य जान लेते हैं।

ARE, WERE: संस्कृत में भव धातु लुट लकार में जब बहुवचन में बदलती है तो उसके आगे अर् प्रत्यय जुड़ जाता है। दो लोगों के लिए यह अरौ और दो से ज्यादा लोगों के लिए आरः के रूप में लिखी जाती है। जैसे भव धातु लुट लकार में प्रथम पुरुष में अगर लिखी जाएगी तो उसका रूप होगा- भविता, भवितारौ, भवितारः। यहां भविता एकवचन, भवितारौ दो वचन और भवितारः बहुवचन के लिए आया है। इज़ और वॉज़ अपने बहुवचन के लिए आर और वर में बदल जाते हैं तो इसके पीछे अंग्रेजी को सूत्र संस्कृत से प्राप्त हुआ है। इस प्रकार सिद्ध होता है कि आर are और वर were का रहस्य इसी भव के बहुवचन रूप में छिपा है।

प्रश्न है कि क्या भारत की संस्कृत परंपरा ने केवल शब्द, व्याकरण और धातु रूपों को लेकर ही विश्व की ज्ञान परंपरा को समृद्ध बनाया था? वस्तुतः अंग्रेजी के प्राचीन शब्द भंडार का विचार करें तो संसार को यह स्वीकार करने में संकोच नहीं करना चाहिए कि जिन शब्दों की उत्पत्ति का कारण आज अंग्रेज जाति के पास नहीं है, उन शब्दों की उत्पत्ति और पूरी भावना के साथ उसकी परंपरा हमें भारत में प्राचीन काल से दिखाई पड़ती है। हम अगर आज के राजनीतिक संदर्भ में चर्चा करें तो अंग्रेजी के राजनीतिक शब्दों का भंडार अपनी मूर्त प्रणाली और परंपरा के साथ भारत की संस्कृत परंपरा से ही उधार लिया गया है।

परिकल्पना, शोध एवं लेखनः प्रो. राकेश कुमार उपाध्याय, भारत अध्ययन केंद्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी-221005
(प्रो. राकेश कुमार उपाध्याय, भारत अध्ययन केंद्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा लिखित ”भारतीय ज्ञान परंपरा का विश्व शब्द-परंपरा पर प्रभाव” नामक प्रकाश्य पुस्तक से उद्धृत)

(क्रमशः)

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