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सहभागिता का चुनाव

सहभागिता का चुनाव

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हमारी प्रकृति में एक द्वैत भाव होता है।  हमारा एक छोर हमेशा इस प्रकृति का हिस्सा हो जाना चाहता है।  उसे पसंद है दौड़ना, खेलना, हवा के साथ चलना, लिखना, नाचना या यूँ कहें कि आस पास में ऐसे रम जाना कि जैसे वह और बाहर एक ही हों।  लेकिन फिर हमारा दूसरा हिस्सा भी है जो सुख चाहता है।  सुख कुछ नहीं, बस हर पल होते आनंद के किसी एक पल से हुआ लगाव है।  हम बस रोक लेना चाहते हैं उस एक पल को क्यूंकि हमारी मानसिकता उससे जुड़ाव अनुभव करती है।

प्रक्रिया से बेईमानी
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भोजन करना एक बहुत ही प्राकृतिक प्रक्रिया है जो हर पल चलती रहती है और जिसके कईं हिस्से हैं।  श्रम करना, एकत्रित करना, पकाना, सूंघना, चखना , पचाना और विसर्जन करना।

लेकिन हम केवल चखने से इतने आसक्त हो जाते हैं कि हम उस पूरी प्रक्रिया को भार समझते हैं या उसमे सहभागिता को ख़तम कर देते हैं।  जैसे जो लोग केवल खाने के स्वाद को सर्वोपरि मानते हैं वह अकसर खाने की गुणवत्ता और मात्रा के चुनाव में बेईमानी कर जाते हैं।  होता क्या है कि या तो बीमारियां, या आलस, या फिर घटते स्वाद से पैदा हुई और खाने की लत हमे घेर लेते हैं।

यह बात खाने की नहीं है हर चीज़ की है , आप खेल का हिस्सा हैं या केवल जीत-हार से आसक्त, आप अपने ऑफिस में एक कर्मशील व्यक्ति हैं या बस पैकेज और इज़्ज़त से आसक्त, आप समाज या परिवार में एक सतत प्रगति को देखते हैं या फिर बस अपने लाभ के पलों को। यहाँ बात स्वार्थ या निस्वार्थ होने की भी नहीं है।

कारण और समय
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अब देखते हैं की हम ऐसा करते क्यों हैं ?
इसका मूल कारण है अविश्वा।  हमारे अंदर इतना अविश्वास है कि  हमे लगता है कि अगर मैंने अपने हिस्से का सुख नहीं रोका या  भविष्य में मुझे यह सुख नहीं मिला तो मैं रह नहीं पाउँगा।  इसीलिए हम उसे इक्कठा करते हैं जैसे स्वाद को, पैसे को, इज़्ज़त को।  हम चाहते हैं कि हमे अगले पल भी वह सुख मिलता रहे, इसीलिए हम समय में उलझे रहते हैं।

“समय” कुछ नहीं बस सुख की पुनरावृति  से आसक्ति है।  इसीलिए जो व्यक्ति इस पल सृष्टि में रमा हुआ है और किसी भी पल से आसक्त नहीं है उसके लिए समय का मानसिक तौर पर कोई मतलब नहीं रह जाता।  जब उसे कहीं पहुंचना ही नहीं तो समय कैसा ?

सामाजिक प्रभाव
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आज के अर्थशास्त्र से लेकर राजनीती तक सब बस इसी आसक्ति में लिप्त है कि वह कैसे सुख का संचय कर सके।  सहभागिता का यहाँ कोई स्थान नहीं है।  वह अमीर और गरीब दोनों के लिए एक जैसा शोषण करता है।  अगर आप आज के अर्थजगत की “अमीर – नीति ” या कैपिटलिज्म को देखें तो आप देखेंगे की उसका पूरा ध्यान (वेल्थ क्रिएशन) धन अर्जन पर है न कि व्यापार चक्र को चलाते रहने पर नहीं।  वह समाज को व्यापार की समरसता में न देख कर उसका हनन कर लेना चाहता है।  उसी तरह से यदि आप समाजवाद यानि “गरीब – नीति” को देखें तो वह दरसल समाज को ऊपर नहीं लाना चाहती, उसे  एक दूसरे की उन्नति में सहभागी नहीं बनाना चाहती बल्कि वह किसी तरह गरीबों में सब्सिडी या डायरेक्ट कैश ट्रांसफर जैसी नीतियों के ज़रिये  सुख भोग को बढ़ाना चाहता है। नेता या समाजवादी गरीबों को अमीरों की जीवन गुणवत्ता के बारे में नहीं दिखाता बल्कि वह उसे यह दिखता है कि ” देखो अमीर की पास कितना ज़मीन या पैसा है”।

सहभागी बने
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हमे यह समझना होगा कि यदि हम ‘सुख भोग की चेतना’ के अनुसार काम करेंगे तो हम हमेशा अगले सुख को लेकर भयगत और पिछले सुख को लेकर दुख ग्रस्त रहेंगे। वहीँ दूसरी ओर यदि हम ‘सहभागिता की चेतना’ से चलेंगे तो ‘समय की अधीनता’ से मुक्त हो जायेंगे।  हर पल बस एक आनंद सा होगा और किसी का कोई शोषण नहीं होगा।  विश्वास और सुदृढ़ होगा। फिर वही दृढ़ विश्वास हमे और अधिक सुख-भोग की चेतना से मुक्त करेगा। हमे समरसता को अपनाना होगा, न सिर्फ दूसरों के लिए बल्कि अपने लिए।  चिड़िया, नदी, सूर्य, आकाश, प्रेम, प्रकृति सब के साथ एक होना होगा।  अपने होने को भूलना होगा और बस यही हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक लाभ की कुंजी है।  सुख भोगी नहीं सहभागी बने।

-धीरज

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