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उनकी फसल अब मंडी परिषद के दांव-पेंच से मुक्त हो गई है।

उनकी फसल अब मंडी परिषद के दांव-पेंच से मुक्त हो गई है।

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मंडी परिषद बाजार राजनीति, भ्रष्टाचार, व्यापारियों और बिचौलिए के एकाधिकार का अखाड़ा हो गया है। देश भर में मंडी परिषद विभिन्न कारणों से किसानों के हित में काम नहीं कर रहा।उदहारण के लिए, मंडी परिषद बाजार में व्यापारियों की सीमित संख्या प्रतिस्पर्धा को कम करती है, अनुचित लाभ के लिए व्यापारियों की गुटबंदी (कार्टिलाइजेशन) को बढ़ावा देती है, बाजार शुल्क के नाम पर किसानो को अनुचित रूप से कम कीमत देती है।

कुछ राज्यों में मंडी परिषद नियम किसानों के हित के लिए इतने नुकसानदेह हैं कि कृषि उपज की बिक्री मंडी क्षेत्र के बाहर होने के बावजूद भी बाजार शुल्क लगाया जाता है। मंडी परिषद नियम कृषि उत्पादों को विभिन्न स्थानों को बेचने में बांधा डालती है और प्रतिस्पर्धा को सीमित करती ​​है।

यदि हम किसानों को न्याय प्रदान करना चाहते हैं, तो मंडी परिषद नियमो में मूलभूत सुधार की तत्काल आवश्यकता है। किसानों के पारिश्रमिक का उचित मूल्य निर्धारण तब तक सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है, जब तक कृषि उपज की बिक्री के लिए उपलब्ध बाज़ारो को बढ़ाया ना जाए।

उपरोक्त कथन मेरा नहीं है। कृषि की संसदीय स्थाई समिति ने जनवरी 2019 की अपनी रिपोर्ट में तीन वर्ष के अध्ययन के बाद यह टिप्पणी की थी। इस समिति के अध्यक्ष हुकुमदेव नारायण यादव थे तथा सभी राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि सांसद इसके सदस्य थे।

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने स्पष्ट किया है की न्यूनतम समर्थन मूल्य कानून का अंग पहले भी नहीं था और एमएसपी कानून का अंग आज भी नहीं है। उन्होंने पूछा कि विपक्ष कई वर्षों तक सत्ता में रहा है और अगर MSP को कानून का हिस्सा बनाना था तब उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया?

आज भी जिन कृषि उत्पादों के लिए MSP निर्धारित की जाती है वे सब के सब MSP की दर पर नहीं खरीदे जाते। अगर MSP को कानून का हिस्सा बना देंगे तो इसका परिणाम यह होगा कि जितने भी उत्पादों की MSP सरकार निर्धारित करेगी, अगर उससे एक रुपए भी कम मिला तो यह कानून का उल्लंघन होगा। अतः किसी भी व्यापारी, उद्यमी तथा दुकानदार को MSP से कम दर पर खरीदे उत्पाद को बेचने के लिए जेल की सजा भी हो सकती है।
परिणामस्वरूप, अगर कृषि उत्पाद मांग से अधिक हुआ तो व्यापारी और उद्यमी कृषको से सीधे उत्पाद नहीं खरीदेगा। वही उत्पाद फिर किसान मंडी परिषद में बेचने के लिए बाध्य हो जाएंगे जहाँ पर उनका शोषण होगा। देखते, देखते कृषि आधारित निजी उद्यम और व्यापार ध्वस्त हो जाएंगे।

ऐसे कानून का एक अन्य दुष्परिणाम भी होगा। अगर सभी उत्पाद MSP की दर पर ही खरीदे जाने हैं तो हर व्यक्ति किसानी की तरफ जाना चाहेगा। हालत यह है कि भारत में अभी भी मांग से अधिक कृषि उत्पाद हो रहा है। आखिरकार कौन खरीदेगा मांग से अधिक उत्पाद?

हमें इन उत्पादों को विश्व में बेचने में भी समस्या आएगी क्योंकि अन्य देश भारत पर आरोप लगा देंगे कि हम अपने कृषि उत्पादों पर सब्सिडी दे रहे हैं जिससे उनका सही मूल्य नहीं लग पा रहा है।

भारत के 86 प्रतिशत किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम कृषि योग्य भूमि है। इनमें से अधिकतर उत्तर प्रदेश और बिहार में स्थित हैं। इस सुधार से छोटे किसानों को लाभ होगा क्योंकि उनकी फसल अब मंडी परिषद के दांव-पेंच से मुक्त हो गई है।

प्रधानमंत्री मोदी ने मंडी परिषद कानून में सुधार करके शरद पवार, चिदंबरम, बादल जैसे “किसानों” की कमर तोड़ दी है।

साभार – अमित सिंघल

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