Menu
विवाह से बाहर के हर संबंध पाप नही होते.. कुछ संबंध पवित्र से भी.. पवित्रतम होते हैं

विवाह से बाहर के हर संबंध पाप नही होते.. कुछ संबंध पवित्र से भी.. पवित्रतम होते हैं

Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on telegram
Share on whatsapp

एक स्त्री, किसी पुरुष की तरफ क्यों आकर्षित होती है.. अथवा एक पुरुष, किसी स्त्री की ओर क्यों खिंचता है??
सामान्य उत्तर तो यही है कि दोनों अर्धांग हैं ! सृष्टि की ऋण-धन ऊर्जाएं हैं !
यिन-यांग हैं, इड़ा-पिंगला हैं, सूर्य चंद्र हैं, वाम-दक्षिण हैं, शिव-शक्ति हैं, प्रकृति-पुरुष हैं !
एक दूसरे के बिना अधूरे हैं, इसीलिए पूर्णता प्राप्त करने के लिए.. एक दूसरे की ओर अग्रसर हैं !!
यह सामान्य उत्तर है !
सांख्य दर्शन कहता है कि प्रकृति पुरुष का सामीप्य न हो.. तो संसार का विस्तार संभव नहीं !!
ऑपोजिट ऊर्जाएं मौजूद न हों , तो जीवन में कोई गति नहीं है !
फिर दोनों के योग से.. संतति भी उत्पन्न होती है.. इसलिए भी, स्त्री -पुरुष का परस्पर खिंचाव प्रकृति प्रदत्त है !
मादा बच्चा जनती है, नर संरक्षण देता है.. इसीलिए वे साहचर्य में रहते हैं !
कालांतर में, होमो सेपियंस की श्रेष्ठता स्थापित होने के पश्चात.. विकास क्रम में, समाज में विवाह संस्था की स्थापना के मूल में भी संभवतः यही कारण विद्यमान रहे होंगे !!
… किंतु तब क्या,
जब किसी स्त्री को, एक पुरुष मिल जाए, संतान भी मिल जाए और संरक्षण भी… तब भी वह दूसरे पुरुष की ओर आकृष्ट हो ???
अथवा किसी पुरुष को, एक स्त्री उपलब्ध हो, संतान भी प्राप्त हो.. तब भी वह दूसरी स्त्री की ओर आकृष्ट हो??
क्या यह वासना है?
अगर उत्तर “हां” है .. तो इस प्रश्न को थोड़ा और उलझा लें !
सपोज़ करें कि एक विवाहित महिला, एक ऐसे पुरुष की तरफ आकर्षित है.. जो उसके पति से कमतर है .. शारीरिक रूप से भी, अधिकार और ताकत में भी !
तब इस आकर्षण को क्या कहिएगा ???
इसी तरह एक पुरुष, किसी ऐसी स्त्री से आकर्षित है..जो उसकी पत्नि से कमतर है… सुंदरता में भी, देहयष्टि में भी !
ऐसे आकर्षण को क्या कहिएगा?
क्या यह वासना है??
दोनों ही स्थितियों में, यह शारीरिक आकर्षण या कामवासना तो कतई नहीं है !
फिर क्या कारण है कि.. स्त्री या पुरुष, अपने दांपत्य के अतिरिक्त… किसी अन्य स्त्री या पुरुष में उत्सुक हो जाते हैं??
अथवा किसी अन्य के ‘प्रेम’ में पड़ जाते हैं?
अवश्य ही पति पत्नी संबंध में कुछ तो ‘मिसिंग’ है !
कुछ तो अभाव है कि एक दूसरे से.. परितृप्ति नहीं मिल पा रही !!
शायद परफेक्ट कपल का चुनाव.. बहुत रहस्यमय फिनोमिना है !
शायद जैव संवेग, संतानोत्पत्ति, परिवार, समाज के गणित से ऊपर भी.. बहुत कुछ छिपा है.. जिस पर हमारी दृष्टि कभी नहीं जाती !!
हम बेहद सामान्य शारीरिक अथवा सामाजिक बातों से प्रभावित होकर..जीवन साथी का चयन कर लेते हैं !! और गलत चयन हो जाने पर पूरे जीवन में एक अतृप्ति बनी रहती है !!
दरअसल हम अपने जीवन को ही बहुत छोटा देखते हैं.. जो कि वह है नहीं ! वह अनंत विस्तारित और चैतन्य का महासमुद्र है !
फिर जब चेतना के इस महासागर में आलोड़न होता है..तो हमारे चयनित ‘पति’ या ‘प्रेमी’ के तटबंध टूट जाते हैं..
अगर उनमें कोई आत्मगत जुड़ाव और प्रेम नहीं होता है.. अथवा वे दोनों ही भावनात्मक रूप से अतृप्त होते हैं !
फिर .. स्त्री अपने भीतर के पुरुष के अनुरूप, बाह्य पुरुष मिलने पर उसकी और सहज ही आकर्षित हो जाती है !
इसी तरह पुरुष भी, अपने भीतर अवस्थित स्त्री को ही.. बाहर ढूंढता है !
जिसमें शरीर की तलाश कम, किंतु भीतरी स्त्री की तलाश अधिक होती है !!
… विवाह संस्था में अक्सर बेमेल जोड़े बन जाते हैं !
वह आयोजित विवाह हो कि प्रेम विवाह.. परफेक्ट कंपैटिबिलिटी, बहुत रेयर ही देखने मिलती है !
अक्सर तो जिस उम्र में विवाह होता है.. तब हमें कैसा जीवन साथी चाहिए, इसकी समझ ही विकसित नहीं हो पाती है !
अमूमन तो.. रंग रूप, कद-काठी, जाति और आर्थिक स्थिति आदि आधार पर ही जोड़े तय हो जाते हैं !
फिर विवाह के बाद पता चलता है कि.. इस स्त्री से तो मेरा कोई मेल ही नहीं है ! अथवा मेरा पति तो निहायत ही अन-रोमांटिक, भौंदू और मांस का लौंदा मात्र निकला !
कंपैटिबिलिटी के अनेक तल होते हैं.. ऊर्जा का तल, भावना का तल, बुद्धि और आत्मा का तल भी !
सक्सेसिवली, नीचे के तल से ऊपर का तल अधिक प्रभावी होता है !
किंतु हमारा निर्णय सिर्फ़ शरीर और अर्थ.. के आधार पर लिया गया होता है ! यह ऊपरी डिस्टेंपर है जो कुछ ही वर्षों में उखड़ जाता है !
शरीर का जादू कुछ दिनों का ही होता है! फिर ऊर्जा का जादू चलता है, उससे भी बढ़कर.. प्रेम और भावनात्मक संवेगों का प्रभाव होता है ! फिर सबसे बढ़कर आत्मा का मेल होता है !
अक्सर तो विवाहित जोड़ों में प्रेम ही नहीं होता, फिर अगर होता भी है तो आत्मा का मेल नहीं होता !
शरीर से अतृप्त स्त्री, शरीर के लिए पुरुष की ओर दौड़ सकती है.. किंतु अगर देह से ऊपर के तलों का मेल नहीं है… तो वह संबंध स्थाई नहीं होने वाला !
क्योंकि शरीर की तृप्ति भी, मात्र शरीर की तृप्ति नहीं है!
वह शरीर के साथ, भाव, बुद्धि और आत्मा की तृप्ति की.. समेकित तृप्ति है !!
एक भी तल अधूरा है.. तो मिलन भी अधूरा ही है !
.. फिर स्त्री तो, पुरुष के स्पर्श से ही.. उसके भीतर बह रहे प्रेम या वासना के स्तर को जान लेती है !
अगर उस छुअन में प्रेम नहीं है.. तो स्त्री वहां अधिक दिन नहीं ठहर सकती है !
वह बिना संभोग के अपने पति के साथ सालों साल रह सकती है.. किंतु, बिना प्रेम का संभोग बर्दाश्त नहीं कर सकती !!
… विवाहित स्त्री अगर, किसी अन्य पुरुष की ओर बढ़ती है.. तो उसके अनेक कारण होते हैं !
बेमेल पुरुष का साथ, उसकी बुद्धि, भावना और चेतना के विस्तार को हर तरफ से अवरुद्ध करता है !
हम सभी स्थूल से सूक्ष्म चेतना की ओर अग्रसर हैं !
हम इस तथ्य को बौद्धिक रूप से न भी जाने.. तो भी यह संज्ञान, हमारी चेतना की इनबिल्ट मेमोरी में इंस्टॉल्ड है !
वर्ना बहुत सी स्त्रियां, अपने टॉल- हैंडसम, हाई सेलरी पेड पति को छोड़कर.. किसी सामान्य से पुरुष की तरफ आकर्षित नही होतीं??
जरूर ही उस पुरुष में कुछ ऐसा है जो उन्हें बांधता है !
जो उनकी कश्ती को पतवार देता है.. उनके नृत्य को आंगन देता है.. और उनकी चेतना के आकाश को विस्तार देता है !
यह आकर्षण शरीरगत नहीं होता बल्कि रूहानी होता है !
.. वरना स्त्री अगर निर्लज्ज हो जाए तो उसे किस पुरुष का जिस्म उपलब्ध नहीं है?
इसी तरह पुरुष भी अगर चार पैसे फेंक दे.. तो बाजार में हजारों जिस्म उपलब्ध हैं !!
.. मगर समाज की संकुचित मनोदृष्टि तो हर स्त्री-पुरुष संबंध को शरीर से जोड़कर ही देखती है !
विवाहित स्त्री अगर किसी पुरुष से प्रेम कर बैठती है.. तो वह बड़ा रिस्क लेती है… यह रिस्क, इस जीवन को गंवाने का रिस्क है ! यह रिस्क, किसी छोटी बात के लिए नहीं लिया जा सकता..
यह किसी महाजीवन को प्राप्त करने के लिए लिया गया रिस्क है !
वरना वह भली तरह जानती है.. के विवाहेतर रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है ! न ही इस रिश्ते को कभी कोई सामाजिक स्वीकृति मिलने वाली है !
किंतु कुछ रिश्ते चेतना को nourish कर जाते हैं !
वह ढेर सारा अनजिया, जो विवाहित जीवन की, मानसिक शारीरिक और आर्थिक आधीनता में छूट गया है… वह उसे जीना चाहती है !
क्योंकि वह चेतना का बड़े से बड़ा nourishment है !
चेतना में मौजूद महाबोध, सामाजिक रीति रिवाज को नहीं मानता !
वह निरंतर विकास की ओर अग्रसर है ! जिस भूमि में उसे अंकुरण की संभावना दिखती है,, उस और परागकण धकेल देता है !!
बेशक उस रिश्ते की उम्र छोटी हो.. मगर वो चेतना के विस्तार की ओर उठाया गया महापग है !
ठीक इसी तरह, एक पुरुष को भी स्त्री के भावनात्मक सामीप्य की दरकार होती ही है !
पुरुष की ऐसी बहुत सी सघन ऊर्जा होती है… जो सिर्फ स्त्री के सानिध्य से ही पिघलती है
उसके कितने ही पुरुष मित्र हों
.. किंतु उसके अवचेतन का बहुत कुछ ऐसा होता है जो सिर्फ स्त्री से ही बंट पाता है !
इसका शारीरिक संबंध से कुछ लेना देना नहीं है, यह भावनात्मक शेयरिंग की बात है
अगर कोई पुरुष अपनी स्त्री को छोड़कर, अन्य स्त्री के पास जाता है… तुम 90 फ़ीसदी मामलों में.. वह सेक्स के लिए नहीं जाता…. बल्कि प्रेम और भावनात्मक सुकून की तलाश में जाता है !
क्षमा करें, यह लेख बड़ा हुआ जा रहा है.. किंतु एक किस्से को सुनाए बिना इसे समाप्त करने का दिल नही कर रहा.. 👇
मुझे याद है, 2001 में, जब मैं एक कंपनी में काम करता था, तो मेरे साथ एक सज्जन काम करते थे… जिनकी उम्र, उस वक्त 48 थी !
वह एक स्त्री के साथ, अक्सर पाए जाते थे जिसकी उम्र संभवतः 35 रही होगी !
वह स्त्री, विडो थी ! गहरे रंग की और सामान्य शक्ल सूरत की थी ! उसके दो बच्चे भी थे !
वह सज्जन भी अत्यंत भद्र और मददगार स्वभाव के थे !
वे अक्सर उस स्त्री के घर आते जाते थे, और उसे स्कूटर में बिठाकर उसके घरेलू कार्यों में मदद के लिए उसे यहाँ वहाँ ले जाया करते थे !
वह जबलपुर में रांझी में रहते थे ! बहुत लोग उनके इस संबंध को गलत दृष्टि से देखा करते थे, और चटखारे ले लेकर.. उनके व उस स्त्री के संबंधों पर कुत्सित और निंदनीय टिप्पणियां किया करते थे !
… मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता था क्योंकि वह बहुत ही प्यारे व्यक्ति थे!
एक रोज मैंने हिम्मत करके उनसे पूछ ही लिया… कि लोग, आपके और उस स्त्री के संबंध में.. बहुत बकवास बातें करते हैं.., आपको यह सब पता भी है.. आपकी पत्नी और बच्चे भी हैं… तो फिर आप उस स्त्री के घर जाना.. बंद क्यों नहीं कर देते !!
उन्होंने जो जवाब दिया था.. वह सोचने जैसा है!
उन्होंने कहा.. मेरी पत्नी, बहुत अच्छी महिला है! मुझे उससे कुछ शिकायत भी नहीं !
किंतु वह शादी के, दो साल बाद से ही… बहुत बीमार रहती है!
मैं उसकी हर तरह से सेवा करता हूं, उसके इलाज पर लाखों रुपए खर्च भी कर चुका हूं, आगे भी करूंगा.. वह इधर अनेक वर्षों से.. लगातार बेड पर ही पड़ी है ! मैं रोजाना ही कई घंटे उसके पहलू पर बैठा रहता हूं !
सारे कर्तव्य जी जान से निभाता हूं ! किंतु मुझे भी एक भावनात्मक सहारे की आवश्यकता है, एक कोमल, स्त्रैण, शीतल सहारे की आवश्यकता… जो जिस्मानी नहीं है, भावनात्मक है.. और यह सुकून किसी पुरुष मित्र के साथ होने से मुझे नहीं मिल पाता !
इसीलिए मैं इस स्त्री के पास आता जाता हूं !
हमारे बीच कोई शारीरिक संबंध नहीं है.. यह बात आप उसे स्त्री से भी पूछ सकते हैं !”
“… उससे मिलने, बात करने, और उसकी मदद करने से मेरी आत्मा को बहुत तृप्ति मिलती है !
इसके लिए मैं सारी बदनामी झेल रहा हूं !
अगर यह सुकून का कोना मैं छोड़ दूंगा.. तो शायद मैं पागल ही हो जाऊंगा !”
… संभवत उस स्त्री के मन में भी उनके प्रति ऐसी ही भावनाएं थी.. क्योंकि मैं उस स्त्री से भी परिचित था… वह भी बहुत भद्र शालीन और कोमल संवेगों से भरी महिला थी !
….. उस दिन मुझे पहली बार यह एहसास हुआ…. कि समाज स्त्री-पुरुष के जिन संबंधों को ग़लत दृष्टि से देखता है…. बहुत बार वह गलत नहीं बल्कि बहुत पवित्र संबंध होते हैं !!
स्त्री कभी भी शरीर के लिए किसी पुरुष से नहीं जुड़ती यह सत्य है….
किंतु यह भी सत्य है कि.. पुरुष भी… हर बार शरीर के लिए ही किसी स्त्री के पास नहीं जाता… बल्कि एक ममत्व भरी शीतल छांव की तलाश में ही जाता है !!
विवाह से बाहर के हर संबंध पाप नही होते.. कुछ संबंध पवित्र से भी.. पवित्रतम होते हैं !

Sharing Is Karma

Share on facebook
Share
Share on twitter
Tweet
Share on linkedin
LinkedIn
Share on telegram
Telegram
Share on whatsapp
WhatsApp
Share on facebook
Share on twitter
Share on telegram
Share on whatsapp

Lekh लेख

• 20 hours ago
  व्यक्ति के जीवन में परिवार की भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण होती है । परिवार में रहकर ही व्यक्ति सेवा, सहकार, सहिष्णुता आदि मानवीय गुणों...

Share now...

• 3 days ago
Garuda, a very popular character in the history of Sanatana Dharma. I think there was no one in Sanatana Dharma who didn’t admire Bhagwan Garuda...

Share now...

• 3 days ago
Hindu concepts of Hiranyagarbha (golden womb) and Brahmanda (the first egg), are comparable to cosmic egg origin systems. The Bhagavata Purana, Brahmanda Purana, Vayu Purana...

Share now...

• 3 days ago
कृष्ण और सुदामा की दोस्ती से तो सब वाकिफ ही होंगे। अगर किसी को कभी दोस्ती की मिसाल देनी हो तो सबसे पहला नाम कृष्ण...

Share now...

• 1 week ago
कुछ वर्षों पहले एक ब्रिटिश पर्यटक ने गुरुग्राम की कुछ शानदार तस्वीरें शेयर करते हुए लिखा था विश्वास नही होता भारत इतना समृद्ध है। हरियाणा...

Share now...

• 1 week ago
इस सप्ताहांत अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रबंध निदेशिका – क्रिस्टीना जॉर्जीवा – का इंटरव्यू पढ़ रहा था। जॉर्जीवा बुल्गारिया की नागरिक है। साम्यवादी बुल्गारिया में...

Share now...

Brahma Logo Bhagwa