ये दीपावली सनातन वाली !

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दीपावली प्रकाश पर्व है, ज्योति का महोत्सव है । दीपावली जितना अंत: लालित्य का उत्सव है, उतना ही बाह्यलालित्य का। जहाँ सदा उजाला हो, साहस पर भरोसा हो, निष्ठा भी हो, वहाँ उत्सव -ही -उत्सव होता है । उजाला सामूहिक रूप में प्रसारित होने से सर्वत्र सौंदर्य खिल जाता है । दीपों की पंक्तियाँ, ज्योति की निष्ठाएँ समाहित हो जाएं तो दीपावली की आभा अभिव्यक्त हो उठती है । दीपावली का लालित्य वस्तुत: प्रकाश एवं अँधेरे का मनोरम स्रमन्वय है । उसमें अप्रगामिता है । दीपावली में दीपों की पंक्तियाँ आखिर पर्व केसे बन जाती हैं ? पर्व का बृहत्तर तात्पर्य है- स्मृति के हजारों तार झनझना उठें, किंतु हम अपने वर्तमान को जीते रहें । यदि हम अपने वर्तमान में नहीं हैं और भविष्य के संग हमारा सम्यक भाव नहीं जुड़ा है तो वह पर्व नहीं विडंबना है, जिसकी लकीर हम पीटने में लगे हैं ।

दीपावली हमें उल्लास से भर देती है। दीपावली सौन्दर्य का अप्रतिम बिंब भी है, जहॉं मनुष्य की अनुभूति, अनुभव एवं संवेदना अपना आकार लेते हैं । दीपावली की ज्योति-प्रक्रिया, स्रोत एवं संरचना एक ऐसी सहृदयता एवं एकता पर आधारित है, जो सबको जोड़कर चलती है । दीयों में दो बातियॉं मिलती हैं । बाती स्नेहसिक्त होनी चाहिए । स्नेह के बिना प्रकाश की कल्पना भी संभव नहीं । वर्तमान समय जिस तरह से नकारात्मकता और संवेदनहीनता का ‘पर्याय’ बना हुआ है, उसमें स्नेह की और भी आवश्यकता है । स्नेह से ही पर्यावरण बनता है, उसी से वास्तविक कलात्मकता आती है । स्नेहरहित होने का अर्थ है- सौंदर्य का क्षरण । दीपावली सौंदर्य की महत्ता का पर्व है । अब भी सर्जनात्मकता, कला तत्व, मूल्य तथा कल्पना अर्थहीन शब्द नहीं हैं । यह पर्व अंधकार को सीमाओं का बृहत्तर अतिक्रमण करता है । दीपावली समाज व व्यक्ति के जीवन के अनगिनत आयामों को नया रूपांकन देती है । ऋषि संस्कृति में कठिनाइयों एवं संघर्षों के बावजूद उल्लास व उजास के रंग भरे पड़े हैं , जो कि देखते ही बनते हैं। ऐसे मौसम का आनंद उठाते हैं , जिसे सम कहा जा सकता है, न जहाँ गरमी और न सरदी । मिट्टी की कला के इतने सारे रूप इस समय देखने को मिलते हैं कि शायद साल भर न मिलते हों । भिन्न-भिन्न तरह के दीये , हाथी, घोडे, पेड़-पौधे ये सभी कुछ मिट्टी की कला से ही निर्मित होते हैं । हमारे यहाँ इन कलाओं को संरक्षित किए जाने की जरूरत है । फाइबर, प्लास्टिक, चीनी मिट्टी आदि के दौर में मिट्टी की कला सहेजी जानी चाहिए । वह सब कुछ सहेजना चाहिए जो हमें कलात्मक रूप से समृद्धि, वैभव, प्रतिभावान बनाता है , उसे बचाकर रखने की आवश्यकता है ।

समाज के सभी वर्ग किसान इत्यादि दीपावली को नई अभिव्यंजना देते हैं । दीपावली के वैभव से किसान का वैभव रचा जाना चाहिए । किसान के वैभव मे ही दीपावली का वैभव छिपा हुआ है । कृषि को राष्ट्रगेय समृद्धि का आधार बनाने की जरूरत है । निम्न व मध्य वर्ग को भी केवल ‘ रियायत ‘ के बल पर लंबे समय तक नहीं चलाया जा सकता, उसे नईं नीति बनाकर आत्मनिर्भर बनाया जाना चाहिए । आजीविका की खोज में दौड़ रहे युवाओ को यदि हम स्वावलंबी बना सकें तो यह एक बड़ा कार्य होगा । धर्मों, जातियों, लिंगों, प्रांतों एवं भाषाओँ की दीवारों को तोड़कर एक ऐसा सामंजस्यपूर्ण विकास चाहिए जो गत्यात्मक भी हो और विवेक से परिपूर्ण भी । विनाश के तट पर विकास सम्भव नहीं है । केवल गाँव या केवल शहर की अतिवादी सोच उचित नहीं है । विकसित गांव एवं शहर ही हमारे लिए नूतन भविष्य की रचना रच सकते हैं । शहर तो हमें चाहिए परंतु वे जो मानवीय सबंधों को बनाए रख सकें । नगरीकरण की प्रक्रिया एवं औद्योगीकरण के लिए यह एक बडी चुनौती है । वास्तव में दीपावली प्रकाश पर्व है, इस प्रकाश में सभी समस्याएँ समाप्त होनी चाहिए ।

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दीपावली के महोत्सव में हमें ऐसे सभी बिंदुओ का पूर्ण मूल्यांकन करने की आवश्यकता है । नई आभा नहीं रची जा सके और यदि बड़े परिवर्तन न संभव हो सकें तो छोटे -छोटे बदलाव लाने चाहिए जो सृजन की दीपावली ला सकते हैं । अतीत के खंडहर से ही अब नई दुनिया सृजित होगी । भारत का पुनरुत्थान यहीं से करना होगा । वर्तमान में ‘राजनीति’ का अर्थ सिर्फ राज पाने के लिए बनी नीति से है , परंतु जो सृज़नता के सापेक्ष नीति होगी वही समाज, राज एवं व्यक्ति को सकारात्मक रूप से जोड़ सकेगी।

दीपावली ऐसे सभी अर्थों की तहों में जाने का दुस्साध्य प्रयत्न है । किसी भी सृजनात्मकता में प्रकाश के अनगिनत रंग होते हैं । दीपावली एक लालित्यपूर्ण सृजनात्मकता है। उजाले की निजता दीपावली को प्रश्नय देती है । उजाले की प्रसारणशीलता उसके सामाजिक पक्ष को नया आयाम देती है। दीपावली परिवर्तन, सौंदर्य, निजता, स्वायत्तता एवं ज्योति, समन्वयन-ये सब एक साथ स्थापित करती है । यह लघुता को सम्मान देती है । छोटा दीया भी यहाँ महत्त्वपूर्ण बन जाता है । यही हमारे सनातन संस्कृति की पहचान है।

दीपावली हमें संकीर्णता, संवादहीनता एवं विद्वेष को भावनाओं को तिरोहित करना सिखाती है । इस प्रकार सोचने से ही हमें दीपावली के वास्तविक मर्म का बोध होगा । दीपावली हमारे भीतर के सृजन को ऊर्जा एवं आभा देती है। सृजन की फुलझडियाँ ही जीवन को नूतन बनाती हैं । इसमें जितनी परंपराओं की सुरक्षा है, सांस्कृतिक परिवर्त्तन है, उतनी ही गतिशीलता का समन्वय भी है । राष्ट्रीयता को अंतर्राष्ट्रीयता एवं क्षेत्रीयता से समन्वित होकर चलना ही उचित है । यदि दृष्टिकोण सकारात्मक हो तो अतीत आधारहीन नहीं होगा, इतिहास संदर्भ मात्र नहीं लगेगा और संस्कृति केवल मिथक नहीं लगेंगी । दीपावली बहुलता का प्रतिरूप है, जिसमें हर दीया सृजन का प्रतीक है । हमें दीपावली में अपने अंदर सृजन के दीये को जलाना चाहिए, जिससे हम स्वयं प्रकाशित हो सकें और राष्ट्र को प्रक्राशपथ पर अग्रासित कर सकें।

 

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