यह चेत जाने की घड़ी है

यह चेत जाने की घड़ी है

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वर्तमान दुनिया बहुत हल्के लोगों के हाथों में है !
हल्के लोग राष्ट्राध्यक्ष बने हुए हैं, हल्के लोग धर्माधीश.. !!
हल्के लोगों के हाथों में हथियार हैं, हल्के लोग मीडिया में हैं, हल्के पत्रकार हैं, हल्के कलाकार, हल्की आवाम.. हल्के लीडरान !!

सर्वत्र हल्केपन का बोलबाला है !

विश्व में दूरंदेशी, प्रामाणिक और ठोस व्यक्तित्वों का न होना इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी है !

विश्व अभूतपूर्व संकटों से गुजर रहा है !
वो अमेज़न के जंगलों में लगी आग हो..कि धरती का बढ़ता तापमान,
हथियारों की होड़ हो.. कि ह्यूमन ट्रेफिकिंग,
चाइल्ड पोर्नोग्राफ़ी हो.. कि चरस में डूबता युवा !
कहीं किसी को कोई फ़िक्र नही है !
सभी अपनी मोमेंटरी किक में डूबे हैं !
तात्कालिक थ्रिल और क्षणिक एक्साइटमेंट.. नवयुग का जीवन मंत्र बन गया है !
फिर वह चाहे राष्ट्र हो, संस्थान हो.. कि व्यक्ति !
हर आंख खुद पर इतनी झुकी है… कि दूसरा इंसान दिख पाना असंभव है !
फिर कीट, पक्षी, ..पशु, वनस्पति, पर्यावरण से संबंध बन पाना तो बहुत दूर की बात है !

सुंदर से सुंदर चेहरे सामने से गुजरते हैं, मगर किसी चेहरे में गहराई नहीं दिखती !
जिम में तराशे शरीर दिखते हैं.. मगर व्यक्तित्व का प्रभामंडल नहीं दिखता !
लंबे लंबे क़द मिलते हैं.. किंतु चेहरों पर तेज नही मिलता !!
किलो-किलो के शरीरों में..छटांक भर बुद्धि भरी है !
चौड़ी छातियों में… पिचकू सी चेतना है !
सुगठित शरीरों पे.. सूक्ष्म भाल हैं !!

व्यक्तित्व में गहराई का अभाव, इस युग की बड़ी से बड़ी समस्या है !
और इसका बुनियादी कारण है.. विश्व में ऐन्द्रिय सुखभोग वाद का बढ़ना !

अनियंत्रित भोग, स्वयं से आगे नहीं देख पाता ! वह प्रकृति का भी दोहन करता है.. और मनुष्यों का भी !
फिर घर/राष्ट्र बड़े होते जाते हैं मगर हृदय की विशालता कम होते जाती है,

बुद्धि बढ़ जाती है मगर भाव खो जाता है,
धन का कोष तो भर जाता है… मगर चेतना का कोश रिक्त रह जाता है !
शरीर तो बन जाता है, मगर व्यक्तित्व नहीं बन पाता !
जो हाथ पहले तलवारबाजी सीखते थे… वही कंप्यूटर और लैपटॉप चलाना सीख लेते हैं !
इस पढ़ाई लिखाई से..जीविकोपार्जन संबंधी अक़्ल तो आ जाती है.. मगर व्यक्तित्व की गहराई नहीं आ पाती !
गहराई तो गहरे जाने से ही आती है !

शरीर से प्राण, प्राण से भावना, भावना से आत्मा में उतरकर.. सर्वत्र, एकत्व देख पाने से ही आती है !
तभी व्यष्टि का समष्टि से जुड़ाव संभव है !!
तभी परहित का भाव, परपीड़ा का अनुभव, अहिंसा और सर्वकल्याण के दीप जल पाना संभव होता है !
किंतु अगर, अधिकाधिक लोग शरीर पर ही रुक जाएं तो विश्व स्थूल चेतना से भर जाता है !
फिर अंततः यही समूह चेतना, युग-चेतना बन जाती है !
फिर यह परलक्षित होती है.. राष्ट्राध्यक्षों के दंभ में, धर्माचार्यों के हठ में, अधिकारियों के अहं में, मीडिया की मनमानी में.. और अपराधियों की क्रूरता में !
वर्तमान युग की यही त्रासदी है कि मनुष्य शरीर पर रुक गया है !

अभी तो हम शरीर के गठन, लंबाई-चौड़ाई-ऊंचाई से ही.. दूसरे को प्रभावित करने में लगे हैं !!
फिल्म अभिनेत्रियां छः छः इंच की हील पहन कर.. ऊंचे से ऊंचा दिखने की होड़ में लगी है..,
युवा, स्टेरॉइड्स और प्रोटीन खा-खाकर अपनी किडनियां खराब कर रहे हैं !!
माएँ हलकान हैं कि,
बच्चे की हाइट कैसे बढ़ जाए?
दुबले बच्चे डिप्रेशन में हैं कि..
मस्क्युलर कैसे बने…?
मोटे लोग अवसाद में है.. कि दुबले कैसे हों??
जो काला है.. वह गोरा होना चाह रहा है,
जो खुरदुरा है.. वह चिकना !!
हमने कद-काठी, बाह्य रंग-रूप को व्यक्तित्व का पैमाना बनाकर रख दिया है !

इससे ज्यादा दुखद बात और क्या हो सकती है कि, मैं हैरान हो जाता हूं कि जब… छोटे-छोटे बच्चों को डिप्रेशन में देखता हूं…. वह भी सिर्फ इसलिए कि वे काले हैं, या मोटे हैं ..अथवा इसलिए कि उनकी हाइट कम है !
एक पढ़ने लिखने वाला होशियार, मेधावी बच्चा…,
एक प्रतिभाशाली, कला-निपुण बच्चा….,
उन डफर बच्चों के सामने स्वयं को सिर्फ इसलिए कमतर पाता है कि वे ..
रंग-रूप या क़द-काठी में उससे बड़े हैं !
कोई आश्चर्य नहीं कि, विश्व भर में जिम, कॉस्मेटिक्स और पार्लर का बिलियन-ट्रिलियन डॉलर्स का कारोबार.. दिन दूना रात चौगुना फल फूल रहा है !
यह चेत जाने की घड़ी है !

शरीरवाद/भोगवाद का यह विस्तार, हमें क्रूर, प्रतिस्पर्धी और कठोर बनाता जा रहा है !!
यह हमारी चेतना को सब ओर से क्षीण कर रहा है !
जघन्य से जघन्य और नृशंस अपराधों का कारण ही यही है कि अपराधी को… सिर्फ अपने सुख से सरोकार है, दूसरे के दुःख और पीड़ा से उसका कुछ लेना देना ही नहीं है !!
ऐसे तो आगामी वर्षों में मानव की खाल में सर्वत्र पशु ही विचरते दिखेंगे !!
प्रभामंडल वाले व्यक्तित्व दिखना ही बंद हो जाएंगे !!
क्योंकि यह निहायत ही हल्केपन का दौर है !!

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