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गृहासक्तस्य नो विद्या नो दया मांसभोजिनः ।
द्रव्यलुब्धस्य नो सत्यं स्त्रैणस्य न पवित्रता ॥

gṛhāsaktasya no vidyā no dayā māṃsabhojinaḥ |
dravyalubdhasya no satyaṃ straiṇasya na pavitratā ||

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He who is engrossed in family life will never acquire knowledge; there can be no mercy in the eater of flesh; the greedy man will not be truthful; and purity will not be found in a woman and a hunter.

जो घर गृहस्थी के काम में लगा रहता है वह कभी ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता. मॉस खाने वाले के ह्रदय में दया नहीं हो सकती. लोभी व्यक्ति कभी सत्य भाषण नहीं कर सकता. और एक शिकारी में कभी शुद्धता नहीं हो सकती.

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