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धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते ।
अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम् ॥

dharmārthakāmamokṣāṇāṃ yasyaiko’pi na vidyate |
ajāgalastanasyeva tasya janma nirarthakam ||

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He who has acquired neither virtue, wealth, satisfaction of desires nor salvation (dharma, artha, kama, moksa), lives an utterly useless life, like the “nipples” hanging from the neck of a goat.

जिस व्यक्ति ने न ही कोई ज्ञान संपादन किया, ना ही पैसा कमाया, मुक्ति के लिए जो आवश्यक है उसकी पूर्ति भी नहीं किया. वह एक निहायत बेकार जिंदगी जीता है जैसे के बकरी की गर्दन से झूलने वाले स्तन.

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