न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा।।1.32।।

na kāṅkṣhe vijayaṁ kṛiṣhṇa na cha rājyaṁ sukhāni cha
kiṁ no rājyena govinda kiṁ bhogair jīvitena vā

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हे कृष्ण मैं न विजय चाहता हूँ न राज्य और न सुखों को ही चाहता हूँ। हे गोविन्द हमें राज्य से अथवा भोगों से और जीने से भी क्या प्रयोजन है।

I desire not victory, O Krishna, nor kingdom, nor pleasures. Of what avail is dominion to us, O Krishna, or pleasures or even life?

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Father is compared to Heaven , Father is Religion, Father is ultimate sacrifice. He is placed at a higher pedestal than all Gods combined.
पिता की तुलना स्वर्ग से की जाती है, पिता धर्म है, पिता परम बलिदान है। वह सभी देवताओं की तुलना में एक उच्च आसन पर रखा जाता है।
  - Chapter 5 - 
Shlok 22
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One who gives birth, one who brings closer (to the Lord, to spirituality - by means of initiating through the sacred thread ceremony), he who gives knowledge, he who gives food, he who protects from fear - these 5 are deemed as fathers.
जो जन्म देता है, वह जो प्रभु के करीब लाता है (आध्यात्मिकता के लिए - पवित्र उपनयन समारोह के माध्यम से आरंभ करने के माध्यम से), वह जो ज्ञान देता है, वह जो भोजन देता है, वह जो भय से रक्षा करता है - इन 5 को पिता माना जाता है ।
जन्मदाता, पालक, विद्यादाता, अन्नदाता, और भयत्राता - ये पाँचों को पिता समझना चाहिए ।
आचार्य चाणक्य संस्कार की दृष्टि से पांच प्रकार के पिता को गिनाते हुए कहते हैं-जन्म देने वाला, उपनयन संस्कार करने वाला, विद्या देने वाला, अन्नदाता तथा भय से रक्षा करने वाला, ये पांच प्रकार के पिता होते हैं।
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Truth is my mother, Knowledge is my father, Righteousness is my brother, Mercy is my friend, Peace is my wife and Forgiveness my son. These six are my kith and kins.
सत्य मेरी माता है, ज्ञान पिता है, भाई धर्म है, दया मित्र है, शान्ति पत्नी है तथा क्षमा पुत्र है, ये छः ही मेरी सगे- सम्बन्धी हैं ।
  - Chapter 271 - 
Shlok 67
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पिता के ७ प्रकार है।कन्यादाता ( कन्यादान करने वाला ) अन्न-भोजन देने वाला , ज्ञान देने वाला (गुरु) , भय से रक्षा करने वाला, जन्म देने वाला, मन्त्र देने वाला (आध्यात्मिक विकास के लिए), एवं ज्येष्ठ भाई ये पिता के प्रकार है।
There are 7 types of father. giver of daughter, giver of food, the giver of knowledge (the guru), the giver of fearlessness, the giver of birth, the giver of mantra (for spiritual growth), and the elder brother are the types of father.
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जिसने प्रथम अर्थात ब्रह्मचर्य आश्रम में विद्या अर्जित नहीं की, द्वितीय अर्थात गृहस्थ आश्रम में धन अर्जित नहीं किया, तृतीय अर्थात वानप्रस्थ आश्रम में कीर्ति अर्जित नहीं की, वह चतुर्थ अर्थात संन्यास आश्रम में क्या करेगा?
मनुष्य के जीवन में चार आश्रम होते है ब्रम्हचर्य, गृहस्थ ,वानप्रस्थ और सन्यास। जिसने पहले तीन आश्रमों में निर्धारित कर्तव्य का पालन किया, उसे चौथे आश्रम / सन्यास में मोक्ष के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता है।
यदि जीवन के प्रथम आश्रम ब्रह्मचर्य में विद्या-अर्जन नहीं किया गया, द्वितीय आश्रम गार्हस्थ्य में धन अर्जित नहीं किया गया, तृतीय आश्रम वानप्रस्थ में कीर्ति अर्जित नहीं की गई, तो फिर चतुर्थ आश्रम में संन्यास लेने का क्या लाभ ? यदि जीवन की चारों अवस्थाओं में निर्धारित कर्म किये जाएं, तभी मुक्ति मिल सकती है। जीवन कर्तव्यों से पलायन का नाम नहीं है।
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जिस प्रकार विविध रंग रूप की गायें एक ही रंग का (सफेद) दूध देती है, उसी प्रकार विविध धर्मपंथ एक ही तत्त्व की सीख देते है।

Namaste Vanakkam Sat Srī Akāl Namaskārām Khurumjari Parnām Tashi Delek Khurumjari 

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Shrimad Bhagavad Gita

न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा।।1.32।।

na kāṅkṣhe vijayaṁ kṛiṣhṇa na cha rājyaṁ sukhāni cha
kiṁ no rājyena govinda kiṁ bhogair jīvitena vā

हे कृष्ण मैं न विजय चाहता हूँ न राज्य और न सुखों को ही चाहता हूँ। हे गोविन्द हमें राज्य से अथवा भोगों से और जीने से भी क्या प्रयोजन है।
I desire not victory, O Krishna, nor kingdom, nor pleasures. Of what avail is dominion to us, O Krishna, or pleasures or even life?

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