अतिक्लेशेन यद्द्रव्यमतिलोभेन यत्सुखम् ।
शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था मा भवन्तु मे ॥

atikleśena yaddravyamatilobhena yatsukham |
śatrūṇāṃ praṇipātena te hyarthā mā bhavantu me ||

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I do not deserve that wealth which is to be attained by enduring much suffering, or by transgressing the rules of virtue, or by flattering an enemy.

मुझे वह दौलत नहीं चाहिए जिसके लिए कठोर यातना सहनी पड़े, या सदाचार का त्याग करना पड़े या अपने शत्रु की चापलूसी करनी पड़े.

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अतिक्लेशेन यद्द्रव्यमतिलोभेन यत्सुखम् ।
शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था मा भवन्तु मे ॥

atikleśena yaddravyamatilobhena yatsukham |
śatrūṇāṃ praṇipātena te hyarthā mā bhavantu me ||

I do not deserve that wealth which is to be attained by enduring much suffering, or by transgressing the rules of virtue, or by flattering an enemy.
मुझे वह दौलत नहीं चाहिए जिसके लिए कठोर यातना सहनी पड़े, या सदाचार का त्याग करना पड़े या अपने शत्रु की चापलूसी करनी पड़े.

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