अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥

Adhibhootam ksharo bhaavah purushashchaadhidaivatam;
Adhiyajno’hamevaatra dehe dehabhritaam vara.

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उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यमय पुरुष (जिसको शास्त्रों में सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भ, प्रजापति, ब्रह्मा इत्यादि नामों से कहा गया है) अधिदैव है और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! इस शरीर में मैं वासुदेव ही अन्तर्यामी रूप से अधियज्ञ हूँ

Adhibhuta (knowledge of the elements) pertains to My perishable Nature, and thePurusha or soul is the Adhidaiva; I alone am the Adhiyajna here in this body, O best among theembodied (men)!

ହେ ଦେହଧାରୀ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଅର୍ଜୁନ, କ୍ଷରଭାବ ବା ନଶ୍ୱର ପଦାର୍ଥ ଅଧିଭୂତ ଅଟେ,ପୁରୁଷ ଅର୍ଥାତ୍‍ ହିରଣ୍ୟଗର୍ଭ ବ୍ରହ୍ମ ଅଧିଦୈବ ଅଟନ୍ତି ଏବଂ ଏ ଦେହରେ ଅନ୍ତର୍ଯ୍ୟାମୀ ରୂପେ ଅବସ୍ଥିତ ଥିବା ମୁଁ ଅଧିଯଜ୍ଞ ।

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