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देयं भोज्यधनं धनं सुकृतिभिर्नो सञ्चयस्तस्य वै
श्रीकर्णस्य बलेश्च विक्रमपतेरद्यापि कीर्तिः स्थिता ।
अस्माकं मधुदानभोगरहितं नाथं चिरात्संचितं
निर्वाणादिति नैजपादयुगलं धर्षन्त्यहो मक्षिकाः ॥

deyaṃ bhojyadhanaṃ dhanaṃ sukṛtibhirno sañcayastasya vai
śrīkarṇasya baleśca vikramapateradyāpi kīrtiḥ sthitā |
asmākaṃ madhudānabhogarahitaṃ nāthaṃ cirātsaṃcitaṃ
nirvāṇāditi naijapādayugalaṃ dharṣantyaho makṣikāḥ ||

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एक गुणवान व्यक्ति को वह सब कुछ दान में देना चाहिए जो उसकी आवश्यकता से अधिक है. केवल दान के कारण ही कर्ण, बाली और राजा विक्रमादित्य आज तक चल रहे है. देखिये उन मधु मख्खियों को जो अपने पैर दुखे से धारती पर पटक रही है. वो अपने आप से कहती है ” आखिर में सब चला ही गया. हमने हमारे शहद को जो बचा कर रखा था, ना ही दान दिया और ना ही खुद खाया. अभी एक पल में ही कोई हमसे सब छीन कर चला गया.”

The meritorious should give away in charity all that they have in excess of their needs. By charity only Karna, Bali and King Vikramaditya survive even today. Just see the plight of the honeybees beating their legs in despair upon the earth. They are saying to themselves, “Alas! We neither enjoyed our stored-up honey nor gave it in charity, and now someone has taken it from us in an instant.”

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