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यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः ।
यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः ॥

yasyārthāstasya mitrāṇi yasyārthāstasya bāndhavāḥ |
yasyārthāḥ sa pumāṁlloke yasyārthāḥ sa ca paṇḍitaḥ ||

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He who has wealth has friends and relations; he alone survives and is respected as a man

वह व्यक्ति जिसके पास धन है उसके पास मित्र और सम्बन्धी भी बहोत रहते है. वही इस दुनिया में टिक पाता है और उसीको इज्जत मिलती है.

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