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गीर्वाणवाणीषु विशिष्टबुद्धि-
स्तथापि भाषान्तरलोलुपोऽहम् ।
यथा सुधायाममरेषु सत्यां
स्वर्गाङ्गनानामधरासवे रुचिः ॥

gīrvāṇavāṇīṣu viśiṣṭabuddhi-
stathāpi bhāṣāntaralolupo’ham |
yathā sudhāyāmamareṣu satyāṃ
svargāṅganānāmadharāsave ruciḥ ||

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यद्पि मेरी बुद्धि देववाणी (संस्कृत) में श्रेष्ठ है, तब भी मै दूसरी भाषा का लालची हूं। जैसे अमृत पीने पर भी देवताओं की इच्छा स्वर्ग की अप्सराओं के ओष्ट रूपी मद्ध को पीने की बनी रहती है।

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