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तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गस्तृणं शूरस्य जीवितम् ।
जिताशस्य तृणं नारी निःस्पृहस्य तृणं जगत् ॥

tṛṇaṃ brahmavidaḥ svargastṛṇaṃ śūrasya jīvitam |
jitāśasya tṛṇaṃ nārī niḥspṛhasya tṛṇaṃ jagat ||

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Heaven is but a straw to him who knows spiritual life (Krsna consciousness); so is life to a valiant man; a woman to him who has subdued his senses; and the universe to him who is without attachment for the world.

जिसने अपने स्वरुप को जान लिया उसके लिए स्वर्ग तो तिनके के समान है. एक पराक्रमी योद्धा अपने जीवन को तुच्छ मानता है. जिसने अपनी कामना को जीत लिया उसके लिए स्त्री भोग का विषय नहीं. उसके लिए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तुच्छ है जिसके मन में कोई आसक्ति नहीं.

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