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प्रीति करि काहु सुख न लह्यो

प्रीति करि काहु सुख न लह्यो

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प्रीति करि काहु सुख न लह्यो

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प्रीति करि काहु सुख न लह्यो।
प्रीति पतंग करी दीपक सों, आपै प्रान दह्यो॥
अलिसुत प्रीति करी जलसुत सों, संपति हाथ गह्यो।
सारँग प्रीति करी जो नाद सों, सन्मुख बान सह्यो॥
हम जो प्रीति करि माधव सों, चलत न कछु कह्यो।
‘सूरदास’ प्रभु बिनु दुख दूनो, नैननि नीर बह्यो॥

उधो, मन न भए दस बीस
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Bhajanब्रह्मभजन

अबिगत गति कछु कहति न आवै।

तुमको कमलनयन कबी गलत

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दूसरो न कोई

अबिगत गति कछु कहति न आवै।

ऊधो, मन माने की बात

सोभित कर नवनीत लिए

रतन-सौं जनम गँवायौ

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म्हारे कीर्तन मे रस बरसाओ

उधो, मन न भए दस बीस

अजहूँ चेति अचेत

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हरि गुन गावत नाचूंगी

maiya raanee jo aane ka vaada karo

मैया रानी जो आने का वादा करो

उधो, मन न भए दस बीस

मन तोये भुले भक्ति बिसारी

उधो, मन न भए दस बीस

तजौ मन, हरि बिमुखनि कौ संग

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