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Brahma

Be the change in order to reclaim the lost glory of Bhārat

Articlesब्रह्मलेख

चिंतनशील लेखक, प्रगतिशील लेख

Brahma
Karma

स्वावलंबी होने का मार्ग ही वास्तविक मार्ग है

कोई डर नहीं, कोई फिकर नहीं! नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।  शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः।। 3.8 श्रीमद्भवगद्गीता। आपके लिए जो निर्धारित कार्य है, उसे मन-बुद्धि लगाकर मनोयोगपूर्वक करो। क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना ही सबसे बढ़िया मार्ग है। और अगर कर्म नहीं करोगे तो

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Brahma
Krishi

उनकी फसल अब मंडी परिषद के दांव-पेंच से मुक्त हो गई है।

मंडी परिषद बाजार राजनीति, भ्रष्टाचार, व्यापारियों और बिचौलिए के एकाधिकार का अखाड़ा हो गया है। देश भर में मंडी परिषद विभिन्न कारणों से किसानों के हित में काम नहीं कर रहा।उदहारण के लिए, मंडी परिषद बाजार में व्यापारियों की सीमित संख्या प्रतिस्पर्धा को कम करती है, अनुचित लाभ के लिए

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Brahma
Dharm

पिता बनकर पुत्र उत्पन्न कीजिये, वही धर्मस्थापना कर सकेंगे।

आजकल के लोग पुत्र उत्पन्न नहीं कर रहे हैं, Son ही पैदा कर रहे हैं और ना ही पुत्र उत्पन्न करना चाहते हैं, Son ही पैदा करना चाहते हैं। पुत्र का अर्थ है पिता जो कर्तव्य पूर्ण ना कर सका, जिस कारण छिद्र रह गया, उन कर्तव्यों को पूर्ण करके

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śloka of the day

!! युग – युगांतर से कर्त्तव्य पथ का मार्गदर्शन करने वाले श्लोक !!

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः।।

इसलिए, तुम अनासक्त होकर सदैव कर्तव्य कर्म का सम्यक् आचरण करो; क्योकि, अनासक्त पुरुष कर्म करता हुआ परमात्मा को प्राप्त होता है।।
Swami Tejomayananda
इसलिये तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्य-कर्मका भलीभाँति आचरण कर; क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है।
Swami Ramsukhdas
अतः कर्मफल में आसक्त हुए बिना मनुष्य को अपना कर्तव्य समझ कर निरन्तर कर्म करते रहना चाहिए क्योंकि अनासक्त होकर कर्म करने से परब्रह्म (परम) की प्राप्ति होती है |
Therefore without attachment perform ever the work that is to be done (done for the sake of the world, lokasangraha, as is made clear immediately afterward); for by doing work without attachment man attains to the highest.
Sri Aurobindo

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः।।

श्रीमद् भगवद्गीता
• Chapter 3
• Shlok 19

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः।।

श्रीमद् भगवद्गीता
• Chapter 3
• Shlok 8

अथातः संप्रत्तिः—यदा प्रैष्यन्मन्यतेऽथ पुत्रमाह, त्वं ब्रह्म, त्वं यज्ञः, त्वं लोक इति; स पुत्रः प्रत्याह, अहं ब्रह्म, अहं यज्ञः, अहं लोक इति; यद्वै किंचानूक्तं तस्य सर्वस्य ब्रह्मेत्येकता । ये वै के च यज्ञस्तेषां सर्वेषां यज्ञ इत्येकता; ये वै के च लोकास्तेषां सर्वेषां लोक इत्येकता; एतावद्वा इदं सर्वम्; एतन्मा सर्वं सन्नयमितोऽभुनजदिति, तस्मात् पुत्रमनुशिष्ठं लोक्यमाहुः, तस्मादेनमनुसशाति; स यदैवंविदस्माल्लोकात्प्रैति, अथैभिरेव प्राणैः सह पुत्रमाविशति । स यद्य् अनेन किंचिदक्ष्णयाऽकृतम् भवति, तस्मादेनं सर्वस्मात्पुत्रो मुञ्चति, तस्मात्पुत्रो नाम; स पुत्रेणैवास्मिंल्लोके प्रतिष्ठति, अथैनमेते दैवाः प्राणा अमृता आविशन्ति ॥ १७ ॥

Brihadaranyaka Upanishad
• Chapter 1.5
• Shlok 17

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!! Collecting and structuring Indic things as they need to be !!

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