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Buddha Brahman aur Sanatan Dharm

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सनातन वैदिक धर्म और उसमें परिकल्पित ब्राह्मण जीवन की व्याख्या भगवान बुद्ध ने भी बहुत सुन्दर ढंग से की थी। श्रावस्ती के जेतवन में कालयक्षिणी ने जब उनसे पूछा था कि धर्म का मर्म क्या है?
तब इक्ष्वाकुवंशी भगवान ने उत्तर दिया था किवैर करने से वैर नहीं खत्म होता, जैसे गंदे पानी से गंदे वस्त्र साफ नहीं होते। वैर तो अवैर अर्थात् मैत्री या क्षमा से ही शान्त होता है। यही सन्त मत है, यही सनातन धर्म है।

स्पष्ट रूप से भगवान बुद्ध ने किसी नए मत-पंथ की बात नहीं की। उन्होंने प्राचीन काल से भारत में चली आ रही धर्म की शाश्वत अवधारणा को ही नवीन शब्दों और अपने जीवन से पुनर्व्याख्यायित किया। जब भी गुरु नई परंपरा डालते हैं, तो पुरानी नींव पर ही नया निर्माण करते है जिसमें शान्ति और निर्वाण प्राप्ति का ही महत्व है, बाकी कोई बात उसमें महत्व नहीं रखती सिवाय जीवन मुक्ति की कामना के। इस शाश्वत मुक्ति के मार्ग में जो भी बाधक है, उन सबका त्याग ही धर्म का मूल है।

आगे भगवान से मिलने के लिए कौशाम्बी के भिक्षु आए तो उन्होंने भिक्षुओं में कलह होते रहने की चर्चा की तो बुद्ध ने उन्हें समझाया कि एक न एक दिन सभी को विनष्ट होना ही है, जो इस तथ्य को भलीभांति गांठ लेते हैं, वह फिर कभी किसी से कलह नहीं करते।

ब्राह्मणों के चरित्र

ब्राह्मणों के चरित्र

भगवान ब्राह्मणों के चरित्र को लेकर स्पष्टता से निर्देश भी करते हैं कि आखिर शुद्ध ब्राह्मण होने का लक्षण क्या है। वह ब्राह्मणों के आदर्श को सीधे तौर पर रेखांकित करते हैं। उनके इस कथन में ब्राह्मण और श्रमण का जीवन, आदर्श, लक्ष्य और लक्षण एक जैसे ही दिखते हैं। श्रमण और ब्राह्मण में गुणों के कारण कोई भेद वह नहीं बताते।

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ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः