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माँ के सभी सपूत गूँथते ज्वलित हृदय की माला।
हिन्दुकुश से महासिंधु तक जगी संघटन-ज्वाला।

हृदय-हृदय में एक आग है, कण्ठ-कण्ठ में एक राग है।
एक ध्येय है, एक स्वप्न, लौटाना माँ का सुख-सुहाग है।

प्रबल विरोधों के सागर में हम सुदृढ़ चट्टान बनेंगे।
जो आकर सर टकराएंगे अपनी-अपनी मौत मरेंगे।

विपदाएँ आती हैं आएँ, हम न रुकेंगे, हम न रुकेंगे।
आघातों की क्या चिंता है ? हम न झुकेंगे, हम न झुकेंगे।

सागर को किसने बाँधा है ? तूफानों को किसने रोका।
पापों की लंका न रहेगी, यह उचांस पवन का झोंका।

आँधी लघु-लघु दीप बुझाती, पर धधकाती है दावानल।
कोटि-कोटि हृदयों की ज्वाला, कौन बुझाएगा, किसमें बल ?

छुईमुई के पेड़ नहीं जो छूते ही मुरझा जाएंगे।
क्या तड़िताघातों से नभ के ज्योतित तारे बुझ पाएँगे ?

प्रलय-घनों का वक्ष चीरकर, अंधकार को चूर-चूर कर।
ज्वलित चुनौती सा चमका है, प्राची के पट पर शुभ दिनकर।

सत्य सूर्य के प्रखर ताप से चमगादड़ उलूक छिपते हैं।
खग-कुल के क्रन्दन को सुन कर किरण-बाण क्या रुक सकते हैं ?

शुध्द हृदय की ज्वाला से विश्वास-दीप निष्कम्प जलाकर।
कोटि-कोटि पग बढ़े जा रहे, तिल-तिल जीवन गला-गलाकर।

जब तक ध्येय न पूरा होगा, तब तक पग की गति न रुकेगी।

आज कहे चाहे कुछ दुनिया कल को बिना झुके न रहेगी।

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