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जिसका सारथि स्वयं ईश्वर हो , उसकी जीत सुनिश्चत है!

जिसका सारथि स्वयं ईश्वर हो , उसकी जीत सुनिश्चत है!

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जिस देवता से हमारे मन का ज़्यादा मेल होता है बहुधा वही देवता हमें अधिक प्रिय होता है !
इस तरह तॊ मुझे श्रीकृष्ण अधिक प्रिय हैं !

वैसे महाभारत में मुझे कर्ण का क़िरदार बहुत लुभाता था ! फिर जब शिवाजी सावंत की ‘मृत्युंजय’ पढ़ी तॊ यह चरित्र दिल-दिमाग़ पर छा ही गया !

महाभारत में कर्ण से अधिक प्रतापी कोई योद्धा कोई नही था ! वहीं भीष्म से पार पाना भी लगभग असंभव ही था !
अगर श्रीकृष्ण न होते ..तॊ पाण्डवों का युद्ध जीत पाना असंभव था !

किंतु श्रीकृष्ण द्वारा युद्धनीति के विरुद्ध कर्ण का वध करवाना , भीष्म पर शिखंडी के पीछे से बाण चलवाना , द्रोणाचार्य , दुर्योधन आदि को छल से मरवाना ..जैसे कृत्य मुझे उचित नही लगते थे !!

अपने से बड़े प्रतापी योद्धाओं के होते भी महाभारत का नायक अर्जुन क्यों है , यह प्रश्न मेरे मन को अक्सर मथा करता था !
फिर 1996 में इस प्रश्न का युक्तियुक्त उत्तर मिला !
यह मानस के मूर्धन्य विद्वान पंडित रामकिंकर उपाध्याय की एक प्रवचनमाला थी , धर्मरथ पर !
जितना मुझे याद है वह इस प्रकार था –

धर्मरथ का सबसे महत्वपूर्ण अंग है –
“सारथी का चयन ”

हममें से अधिकतर लोग ‘मन’ को सारथी बनाकर जीवन रथ चलाते हैं !
..किंतु मन तॊ विषयों की ओर ही भागता है ..इसलिए मन अगर सारथी है , तॊ रथ का दिशाहीन होना तय है !

तॊ क्या बुद्धि को सारथी बनाएं ?
निःसंदेह , बुद्धि मन से श्रेष्ठ है , किंतु तब भी वह तर्क-वितर्क पर आधारित है !
वह ग़लत बात के पक्ष में भी तर्क देकर उसे सही सिद्ध कर सकती है !
और जब दोनों तरफ तर्क एक बराबर खड़े हो जाएं ..तॊ बुद्धि किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति उत्पन्न कर देती है !

महाभारत में द्रौपदी चीरहरण सहित अनेक प्रसंगों में भीष्म और कर्ण जैसे विद्वान पुरुष किंकर्तव्यविमूढ़ हुए हैं !
कुरुक्षेत्र में अर्जुन भी तॊ सगे संबंधियों को सामने देखकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था !

..तॊ क्या चित्त को सारथी बनाएं ?
किंतु चित्त तॊ संस्कारों का स्टोर हाऊस है ! वह तॊ संस्काराबद्ध होकर ही निर्णय लेता है !
अतः चित्त को सारथी बनाकर भी गंतव्य तक नही पहुंचा जा सकता !

अर्थात , धर्मरथ के सारे हिस्से कितने ही मज़बूत क्यों न हों , सबसे महत्वपूर्ण तॊ सारथि का चयन ही है !!
सारथि ही केंद्रीय भाव है !
सारथि ही खेवनहार है !!

फिर , महाभारत में बड़े से बड़े पराक्रमी , ज्ञानी , श्रेष्ठ स्थापित महापुरुषों ने अन्तःकरण की एक अन्य वस्तु को सारथि बनाया था , वह है “अहं ” !

हममें भी अधिकांश लोग अहं को ही सारथी बनाकर चलते हैं !

कर्ण सूर्य-पुत्र है ! नीति निपुण है , महायोद्धा है ! सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर है , परम विद्वान भी है !
किंतु उसका सारथी “अहं” है , आहत अहं !

युद्धारंभ से पूर्व एक प्रसंग में जब वासुदेव कृष्ण , रास्ते में जा रहे कर्ण को अपने रथ में बैठाते हैं …और उसे सारे राज खोल देते हैं कि वह सूतपुत्र नही , बल्कि सूर्यपुत्र है !
यह भी कि वह पांडवों का ज्येष्ठ भ्राता है !

कृष्ण कहते हैं कि “तुम इतने उच्च होकर भी अधर्मी दुर्योधन का साथ क्यों दे रहे हो ? ”
तॊ कर्ण का यही ज़वाब था कि दुर्योधन ने उस वक़्त मेरा साथ दिया जब भरी सभा में मुझे तिरस्कृत किया जा रहा था ! औऱ अब अगर मैं उसे छोड़ता हूं ..तॊ दुनिया मुझे क्या कहेगी !!
मेरी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाएगी !!

यह कर्ण का अहं ही था जो उसे कुपथ्य छोड़ने में बाधा बन गया था , और जिसने उसे धर्म के पक्ष में आने से रोक दिया था !
सब जानकर भी कर्ण ने दुर्योधन का साथ न छोड़ा !
कर्ण में सारे ही गुण थे किंतु , मात्र एक ही अवगुण था “अहं ” !
फिर जिसका सारथी अहं है , उसका जीवनरथ अंततः कीचड़ में फंस ही जाता है !!

यही अहं , भीष्म जैसे महान योद्धा के नाश का भी कारण बना !
भीष्म , हस्तिनापुर के सिंहासन से बंधी अपनी निष्ठा और तदरूप ली हुई अपनी प्रतिज्ञा को ही स्वधर्म मानकर चल रहे थे !
अपने पक्ष को पूर्णतः धर्म विरुद्ध जानते हुए भी वे शब्दरूप में ली हुई अपनी प्रतिज्ञा की दुहाई देते रहे ..तॊ उसकी तह में यह ‘अहं’ ही कार्यरत था कि .’मैंने जो कह दिया , उसे निभाकर ही रहता हूं !!
वह अहं , जो धर्म के विरुद्ध खड़ा कर दे , आख़िरकार बाणों से बिध ही जाता है और उसका पराभव ही होता है !!

धर्म क्या है ?
वस्तुतः बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष ही धर्म है !!
सद की ओर गति ही धर्म है !
किंतु जब हम धर्म को व्यक्तिविशेष से जोड़ देते हैं तब किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति उत्पन्न होती है !
महाभारत में यह स्थिति उस काल के लगभग समस्त श्रेष्ठ पुरूषों के सम्मुख उत्पन्न होती है !!

यही किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति कुरुक्षेत्र में अर्जुन के सामने भी उत्पन्न हुई थी !!

अंततः तॊ हमारे अंतःस्थल में अत्यंततम गहराई में छिपा हुआ सूक्ष्मतम अहं ही एक दिन अपने विकराल रूप में प्रकट होकर किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति पैदा करता है !

रामायण में यही स्थिति विभीषण के सामने पैदा हुई थी ..किंतु , विभीषण का सारथि मन , बुद्धि अहं नही बल्कि श्रीराम ही थे !
राम यानि ..परम चेतना , जो पूर्ण समर्पण से ही उपलब्ध होती है !!
इसीलिए विभीषण को राम के पक्ष में आने में देर न लगी !!

महाभारत में कौरव पक्ष के सभी महान योद्धा पराजित हुए ….क्योंकि “सारथि” का चयन ग़लत था !
किसी ने मन को किसी ने बुद्धि को , किसी ने अहं को …तॊ किसी ने लोकाचार या शास्त्र वचन को सारथि बना लिया था !!

महाभारत का नायक अर्जुन है !
क्योंकि जीत अर्जुन की हुई थी !
क्योंकि अर्जुन ने सारथि का चयन ठीक किया !
इस एक निर्णय ने पूरी महाभारत का पासा पलट दिया !
अर्जुन निश्चल चित्त का व्यक्ति था ! श्रीकृष्ण के प्रति उसकी निष्ठा पूर्ण थी !
यही कारण है कि उसने अपना सारथि मन , बुद्धि , अहं को नही बल्कि वासुदेव श्रीकृष्ण को चुना और फिर उनके हर निर्देश का अक्षरशः पालन भी किया !!

और फिर जिसका सारथि स्वयं ईश्वर हो , उसकी जीत सुनिश्चत है!

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