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Shlok

Brahma Shloka

A progressive, modern, crowd-sourced library of ancient Sanatan shlokas.

Trending Shloka

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Father is compared to Heaven , Father is Religion, Father is ultimate sacrifice. He is placed at a higher pedestal than all Gods combined.
पिता की तुलना स्वर्ग से की जाती है, पिता धर्म है, पिता परम बलिदान है। वह सभी देवताओं की तुलना में एक उच्च आसन पर रखा जाता है।
  - Chapter 5 - 
Shlok 22
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One who gives birth, one who brings closer (to the Lord, to spirituality - by means of initiating through the sacred thread ceremony), he who gives knowledge, he who gives food, he who protects from fear - these 5 are deemed as fathers.
जो जन्म देता है, वह जो प्रभु के करीब लाता है (आध्यात्मिकता के लिए - पवित्र उपनयन समारोह के माध्यम से आरंभ करने के माध्यम से), वह जो ज्ञान देता है, वह जो भोजन देता है, वह जो भय से रक्षा करता है - इन 5 को पिता माना जाता है ।
जन्मदाता, पालक, विद्यादाता, अन्नदाता, और भयत्राता - ये पाँचों को पिता समझना चाहिए ।
आचार्य चाणक्य संस्कार की दृष्टि से पांच प्रकार के पिता को गिनाते हुए कहते हैं-जन्म देने वाला, उपनयन संस्कार करने वाला, विद्या देने वाला, अन्नदाता तथा भय से रक्षा करने वाला, ये पांच प्रकार के पिता होते हैं।
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Truth is my mother, Knowledge is my father, Righteousness is my brother, Mercy is my friend, Peace is my wife and Forgiveness my son. These six are my kith and kins.
सत्य मेरी माता है, ज्ञान पिता है, भाई धर्म है, दया मित्र है, शान्ति पत्नी है तथा क्षमा पुत्र है, ये छः ही मेरी सगे- सम्बन्धी हैं ।
  - Chapter 271 - 
Shlok 67
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पिता के ७ प्रकार है।कन्यादाता ( कन्यादान करने वाला ) अन्न-भोजन देने वाला , ज्ञान देने वाला (गुरु) , भय से रक्षा करने वाला, जन्म देने वाला, मन्त्र देने वाला (आध्यात्मिक विकास के लिए), एवं ज्येष्ठ भाई ये पिता के प्रकार है।
There are 7 types of father. giver of daughter, giver of food, the giver of knowledge (the guru), the giver of fearlessness, the giver of birth, the giver of mantra (for spiritual growth), and the elder brother are the types of father.
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जिसने प्रथम अर्थात ब्रह्मचर्य आश्रम में विद्या अर्जित नहीं की, द्वितीय अर्थात गृहस्थ आश्रम में धन अर्जित नहीं किया, तृतीय अर्थात वानप्रस्थ आश्रम में कीर्ति अर्जित नहीं की, वह चतुर्थ अर्थात संन्यास आश्रम में क्या करेगा?
मनुष्य के जीवन में चार आश्रम होते है ब्रम्हचर्य, गृहस्थ ,वानप्रस्थ और सन्यास। जिसने पहले तीन आश्रमों में निर्धारित कर्तव्य का पालन किया, उसे चौथे आश्रम / सन्यास में मोक्ष के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता है।
यदि जीवन के प्रथम आश्रम ब्रह्मचर्य में विद्या-अर्जन नहीं किया गया, द्वितीय आश्रम गार्हस्थ्य में धन अर्जित नहीं किया गया, तृतीय आश्रम वानप्रस्थ में कीर्ति अर्जित नहीं की गई, तो फिर चतुर्थ आश्रम में संन्यास लेने का क्या लाभ ? यदि जीवन की चारों अवस्थाओं में निर्धारित कर्म किये जाएं, तभी मुक्ति मिल सकती है। जीवन कर्तव्यों से पलायन का नाम नहीं है।
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जिस प्रकार विविध रंग रूप की गायें एक ही रंग का (सफेद) दूध देती है, उसी प्रकार विविध धर्मपंथ एक ही तत्त्व की सीख देते है।
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यदि हंस ही पानी और दूध को अलग करने का काम छोड़ देगा तो ये काम इतनी कुशलता से और कौन कर पाएगा? यदि बुद्धिमान तथा समझदार लोग ही अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाएंगे तो दूसरा कौन निभाएगा?
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यदि कोई आग, ऋण, या शत्रु अल्प मात्रा अथवा न्यूनतम सीमा तक भी अस्तित्व में बचा रहेगा तो बार बार बढ़ेगा ; अत: इन्हें थोड़ा सा भी बचा नही रहने देना चाहिए । इन तीनों को सम्पूर्ण रूप से समाप्त ही कर डालना चाहिए ।
If a fire, a loan, or an enemy continues to exist even to a small extent, it will grow again and again; so do not let any one of it continue to exist even to a small extent.
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आलसी इन्सान को विद्या कहाँ ? विद्याविहीन को धन कहाँ ? धनविहीन को मित्र कहाँ ? और मित्रविहीन को सुख कहाँ ?
आलसी को विद्या कहाँ अनपढ़ / मूर्ख को धन कहाँ निर्धन को मित्र कहाँ और अमित्र को सुख कहाँ |
Lazy cannot acquire knowledge. Without knowledge, wealth cannot be had. Without wealth, you cannot get friends and without friends, there is no happiness.
आळशी माणसाला विद्या कशी मिळणार, ज्याच्याकडे विद्या नाही त्याला संपत्ती कशी मिळणार, ज्याच्याकडे संपत्ती नाही त्याला मित्र कुठून आणि मित्र नसलेल्याला सुख कसे मिळणार? (थोडक्यात आळशी माणसाला सुख मिळणे अवघड आहे).
जो आलस करते हैं उन्हें विद्या नहीं मिलती, जिनके पास विद्या नहीं होती वो धन नहीं कमा सकता, जो निर्धन हैं उनके मित्र नहीं होते और मित्र के बिना सुख की प्राप्ति नहीं होती ।
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जो लोग अपना कर्म छोडकर केवल कृष्ण कृष्ण बोलते रहते हैं, वे हरि के द्वेषी हैं ।
  - Chapter 7 - 
Shlok 1
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श्री भगवान बोले- हे पार्थ! अनन्य प्रेम से मुझमें आसक्त चित तथा अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्यादि गुणों से युक्त, सबके आत्मरूप मुझको संशयरहित जानेगा, उसको सुन॥1॥

Recently added shlokas

  - Chapter 12.1 - 
Shlok 62
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We aspire to live long, our children too would live long and be free from sickness and consumption. We all are reared up in the lap of the Mother Earth. May we have long life (provided) we are watchful and alert and sacrifice our all for Her.
हम लंबे समय तक जीने की कामना करते हैं, हमारे बच्चे भी लंबे समय तक जीवित रहेंगे और बीमारी और उपभोग से मुक्त रहेंगे। हम सब धरती माता की गोद में पले-बढ़े हैं। हम दीर्घायु हों (बशर्ते) हम सतर्क और सतर्क रहें और उसके लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दें।
  - Chapter 4 - 
Shlok 42
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इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन हृदयमें स्थित इस अज्ञानसे उत्पन्न अपने संशय का ज्ञानरूप तलवार से छेदन करके योग(समता) में स्थित हो जा (और युद्धके लिये) खड़ा हो जा।
Therefore, with the sword of knowledge, cut asunder the doubts that have arisen in your heart. O scion of Bharat, establish yourself in karm yog. Arise, stand up, and take action!
  - Chapter 4 - 
Shlok 41
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जिसने योगद्वारा कर्मों का संन्यास किया है ज्ञानद्वारा जिसके संशय नष्ट हो गये हैं ऐसे आत्मवान् पुरुष को हे धनंजय कर्म नहीं बांधते हैं।
O Arjun, actions do not bind those who have renounced karm in the fire of Yog, whose doubts have been dispelled by knowledge, and who are situated in knowledge of the self.
  - Chapter 4 - 
Shlok 40
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विवेकहीन और श्रद्धारहित संशयात्मा मनुष्य का पतन हो जाता है। ऐसे संशयात्मा मनुष्यके लिये न यह लोक है न परलोक है और न सुख ही है।
But persons who possess neither faith nor knowledge, and who are of a doubting nature, suffer a downfall. For the skeptical souls, there is no happiness either in this world or the next.
  - Chapter 4 - 
Shlok 39
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श्रद्धावान् तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है।
Those whose faith is deep and who have practiced controlling their mind and senses attain divine knowledge. Through such transcendental knowledge, they quickly attain everlasting supreme peace.
  - Chapter 4 - 
Shlok 38
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इस मनुष्यलोक में ज्ञान के समान पवित्र करनेवाला दूसरा कोई साधन नहीं है। जिसका योग भलीभाँति सिद्ध हो गया है वह (कर्मयोगी) उस तत्त्वज्ञान को अवश्य ही स्वयं अपनेआप में पा लेता है।
In this world, there is nothing as purifying as divine knowledge. One who has attained purity of mind through prolonged practice of Yog, receives such knowledge within the heart, in due course of time.
  - Chapter 4 - 
Shlok 37
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हे अर्जुन जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को सर्वथा भस्म कर देती है ऐसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को सर्वथा भस्म कर देती है।
As a kindled fire reduces wood to ashes, O Arjun, so does the fire of knowledge burn to ashes all reactions from material activities.
  - Chapter 4 - 
Shlok 36
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अगर तू सब पापियों से भी अधिक पापी है तो भी तू ज्ञानरूपी नौका के द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पाप समुद्रसे अच्छी तरह तर जायगा।
Even those who are considered the most immoral of all sinners can cross over this ocean of material existence by seating themselves in the boat of divine knowledge.
  - Chapter 4 - 
Shlok 35
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जिस(तत्त्वज्ञान) का अनुभव करने के बाद तू फिर इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगा और हे अर्जुन जिस(तत्त्वज्ञान)से तू सम्पूर्ण प्राणियों को निःशेषभाव से पहले अपने में और उसके बाद मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में देखेगा।
Following this path and having achieved enlightenment from a Guru, O Arjun, you will no longer fall into delusion. In the light of that knowledge, you will see that all living beings are but parts of the Supreme, and are within me.
  - Chapter 4 - 
Shlok 34
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उस(तत्त्वज्ञान)को (तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषों के पास जाकर) समझ। उनको साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम करने से उनकी सेवा करने से और सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुष तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश देंगे।
Learn the Truth by approaching a spiritual master. Inquire from him with reverence and render service unto him. Such an enlightened Saint can impart knowledge unto you because he has seen the Truth.
  - Chapter 4 - 
Shlok 33
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हे परन्तप द्रव्यों से सम्पन्न होने वाले यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ सम्पूर्ण अखिल कर्म ज्ञान में समाप्त होते हैं अर्थात् ज्ञान उनकी पराकाष्ठा है।
O subduer of enemies, sacrifice performed in knowledge is superior to any mechanical material sacrifice. After all, O Parth, all sacrifices of work culminate in knowledge.
  - Chapter 4 - 
Shlok 32
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ऐसे अनेक प्रकार के यज्ञों का ब्रह्मा के मुख अर्थात् वेदों में प्रसार है अर्थात् वर्णित हैं। उन सब को कर्मों से उत्पन्न हुए जानो इस प्रकार जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।
All these different kinds of sacrifice have been described in the Vedas. Know them as originating from different types of work; this understanding cuts the knots of material bondage.
  - Chapter 4 - 
Shlok 31
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हे कुरुवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करनेवाले मनुष्य के लिये यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है फिर परलोक कैसे सुखदायक होगा ?
Those who know the secret of sacrifice, and engaging in it, partake of its remnants that are like nectar, advance toward the Absolute Truth. O best of the Kurus, those who perform no sacrifice find no happiness either in this world or the next.
  - Chapter 4 - 
Shlok 30
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दूसरे नियमित आहार करने वाले (साधक जन) प्राणों को प्राणों में हवन करते हैं। ये सभी यज्ञ को जानने वाले हैं जिनके पाप यज्ञ के द्वारा नष्ट हो चुके हैं।
Yet others curtail their food intake and offer the breath into the life-energy as sacrifice. All these knowers of sacrifice are cleansed of their impurities as a result of such performances.
  - Chapter 4 - 
Shlok 29
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दूसरे कितने ही प्राणायाम के परायण हुए योगी लोग अपान में प्राण का पूरक करके प्राण और अपान की गति रोककर फिर प्राण में अपान का हवन करते हैं l
Still others offer as sacrifice the outgoing breath in the incoming breath, while some offer the incoming breath into the outgoing breath. Some arduously practice prāṇāyām and restrain the incoming and outgoing breaths, purely absorbed in the regulation of the life-energy.
  - Chapter 4 - 
Shlok 28
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कुछ (साधक) द्रव्ययज्ञ तपयज्ञ और योगयज्ञ करने वाले होते हैं और दूसरे कठिन व्रत करने वाले स्वाध्याय और ज्ञानयज्ञ करने वाले योगीजन होते हैं।
Some offer their wealth as sacrifice, while others offer severe austerities as sacrifice. Some practice the eight-fold path of yogic practices, and yet others study the scriptures and cultivate knowledge as sacrifice, while observing strict vows.
  - Chapter 4 - 
Shlok 27
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दूसरे (योगीजन) सम्पूर्ण इन्द्रियों के तथा प्राणों के कर्मों को ज्ञान से प्रकाशित आत्मसंयमयोगरूप अग्नि में हवन करते हैं।
Some, inspired by knowledge, offer the functions of all their senses and their life energy in the fire of the controlled mind.
  - Chapter 4 - 
Shlok 26
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अन्य योगी लोग श्रोत्रादि समस्त इन्द्रियों का संयमरूप अग्नियों में हवन किया करते हैं और दूसरे योगीलोग शब्दादि विषयों का इन्द्रियरूप अग्नियों में हवन किया करते हैं।
Others offer hearing and other senses in the sacrificial fire of restraint. Still others offer sound and other objects of the senses as sacrifice in the fire of the senses.
  - Chapter 4 - 
Shlok 25
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कोई योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ को ही करते हैं और दूसरे (ज्ञानीजन) ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ के द्वारा यज्ञ को हवन करते हैं।
Some yogis worship the celestial gods with material offerings unto them. Others worship perfectly who offer the self as sacrifice in the fire of the Supreme Truth.
  - Chapter 4 - 
Shlok 24
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जिस यज्ञ में अर्पण भी ब्रह्म है हवि भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म है (ऐसे यज्ञ को करनेवाले) जिस मनुष्य की ब्रह्म में ही कर्म समाधि हो गयी है उसके द्वारा प्राप्त करने योग्य फल भी ब्रह्म ही है।
For those who are completely absorbed in God-consciousness, the oblation is Brahman, the ladle with which it is offered is Brahman, the act of offering is Brahman, and the sacrificial fire is also Brahman. Such persons, who view everything as God, easily attain him.
  - Chapter 4 - 
Shlok 23
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जिसकी आसक्ति सर्वथा मिट गयी है जो मुक्त हो गया है जिसकी बुद्धि स्वरूप के ज्ञान में स्थित है ऐसे केवल यज्ञ के लिये कर्म करनेवाले मनुष्यके सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं।
They are released from the bondage of material attachments and their intellect is established in divine knowledge. Since they perform all actions as a sacrifice (to God), they are freed from all karmic reactions.
  - Chapter 4 - 
Shlok 22
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जो (कर्मयोगी) फल की इच्छा के बिना अपनेआप जो कुछ मिल जाय उस में सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्या से रहित द्वन्द्वों से अतीत तथा सिद्धि और असिद्धि में सम है वह कर्म करते हुए भी उससे नहीं बँधता।
Content with whatever gain comes of its own accord, and free from envy, they are beyond the dualities of life. Being equipoised in success and failure, they are not bound by their actions, even while performing all kinds of activities.
  - Chapter 4 - 
Shlok 21
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जो आशा रहित है तथा जिसने चित्त और आत्मा (शरीर) को संयमित किया है जिसने सब परिग्रहों का त्याग किया है ऐसा पुरुष शारीरिक कर्म करते हुए भी पाप को नहीं प्राप्त होता है।
Free from expectations and the sense of ownership, with mind and intellect fully controlled, they incur no sin, even though performing actions by one’s body.
  - Chapter 4 - 
Shlok 20
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जो कर्म और फल की आसक्ति का त्याग कर के आश्रय से रहित और सदा तृप्त है वह कर्मों में अच्छी तरह से लगा हुआ भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता।
Such people, having given up attachment to the fruits of their actions, are always satisfied and not dependent on external things. Despite engaging in activities, they do not do anything at all.
  - Chapter 4 - 
Shlok 19
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जिसके सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ संकल्प और कामना से रहित हैं तथा जिसके सम्पूर्ण कर्म ज्ञानरूपी अग्निसे जल गये हैं उसको ज्ञानिजन भी पण्डित (बुद्धिमान्) कहते हैं।
The enlightened sages call those persons wise, whose every action is free from the desire for material pleasures and who have burnt the reactions of work in the fire of divine knowledge.
  - Chapter 4 - 
Shlok 18
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जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है वह मनुष्यों में बुद्धिमान् है योगी है और सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है।
Those who see action in inaction and inaction in action are truly wise amongst humans. Although performing all kinds of actions, they are yogis and masters of all their actions.
  - Chapter 4 - 
Shlok 17
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कर्म का (स्वरूप) जानना चाहिये और विकर्म का (स्वरूप) भी जानना चाहिये (बोद्धव्यम्) तथा अकर्म का भी (स्वरूप) जानना चाहिये (क्योंकि) कर्म की गति गहन है।
You must understand the nature of all three—recommended action, wrong action, and inaction. The truth about these is profound and difficult to understand.
  - Chapter 4 - 
Shlok 16
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कर्म क्या है और अकर्म क्या है इस प्रकार इस विषय में विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं। अतः वह कर्मतत्त्व मैं तुम्हें भलीभाँति कहूँगा जिसको जानकर तू अशुभ(संसार बन्धन)से मुक्त हो जायगा।
What is action and what is inaction? Even the wise are confused in determining this. Now I shall explain to you the secret of action, by knowing which, you may free yourself from material bondage.
  - Chapter 4 - 
Shlok 15
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पूर्वकाल के मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर कर्म किये हैं इसलिये तू भी पूर्वजों के द्वारा सदा से किये जानेवाले कर्मों को ही (उन्हीं की तरह) कर।
Knowing this truth, even seekers of liberation in ancient times performed actions. Therefore, following the footsteps of those ancient sages, you too should perform your duty.
  - Chapter 4 - 
Shlok 14
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कर्म मुझे लिप्त नहीं करते न मुझे कर्मफल में स्पृहा है। इस प्रकार मुझे जो जानता है वह भी कर्मों से नहीं बन्धता है।
Activities do not taint me, nor do I desire the fruits of action. One who knows me in this way is never bound by the karmic reactions of work.
  - Chapter 4 - 
Shlok 13
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मेरे द्वारा गुणों और कर्मों के विभागपूर्वक चारों वर्णों की रचना की गयी है। उस(सृष्टिरचना आदि) का कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय परमेश्वरको तू अकर्ता जान। कारण कि कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्त्व से जान लेता है वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता।
The four categories of occupations were created by me according to people’s qualities and activities. Although I am the creator of this system, know me to be the non-doer and eternal.
  - Chapter 4 - 
Shlok 12
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कर्मों की सिद्धि (फल) चाहने वाले मनुष्य देवताओं की उपासना किया करते हैं क्योंकि इस मनुष्यलोक में कर्मों से उत्पन्न होनेवाली सिद्धि जल्दी मिल जाती है।
In this world, those desiring success in material activities worship the celestial gods, since material rewards manifest quickly.
  - Chapter 4 - 
Shlok 11
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हे पृथानन्दन जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्ग का अनुकरण करते हैं।
In whatever way people surrender unto me, I reciprocate with them accordingly. Everyone follows my path, knowingly or unknowingly, O son of Pritha.
  - Chapter 4 - 
Shlok 10
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राग भय और क्रोध से सर्वथा रहित मेरे में ही तल्लीन मेरे ही आश्रित तथा ज्ञानरूप तप से पवित्र हुए बहुत से भक्त मेरे भाव(स्वरूप) को प्राप्त हो चुके हैं।
Being freed from attachment, fear, and anger, becoming fully absorbed in me, and taking refuge in me, many persons in the past became purified by knowledge of me, and thus they attained my divine love.
  - Chapter 4 - 
Shlok 9
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हे अर्जुन मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इस प्रकार (मेरे जन्म और कर्मको) जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मान लेता है वह शरीरका त्याग करके पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता प्रत्युत मुझे प्राप्त होता है।
Those who understand the divine nature of my birth and activities, O Arjun, upon leaving the body, do not have to take birth again, but come to my eternal abode.
  - Chapter 4 - 
Shlok 8
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साधुओं(भक्तों) की रक्षा करने के लिये पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिये और धर्म की भली भाँति स्थापना करने के लिये मैं युग युगमें प्रकट हुआ करता हूँ।
To protect the righteous, to annihilate the wicked, and to reestablish the principles of dharma I appear on this earth, age after age.
  - Chapter 4 - 
Shlok 7
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हे भरतवंशी अर्जुन जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है तब तब ही मैं अपने आपको साकार रूप से प्रकट करता हूँ।
Whenever there is a decline in righteousness and an increase in unrighteousness, O Arjun, at that time I manifest myself on earth.
  - Chapter 4 - 
Shlok 6
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मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते हुए भी तथा सम्पूर्ण प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।
Although I am unborn, the Lord of all living entities, and have an imperishable nature, yet I appear in this world by virtue of Yogmaya, my divine power.
  - Chapter 4 - 
Shlok 5
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श्रीभगवान् बोले हे परन्तप अर्जुन मेरे और तेरे बहुतसे जन्म हो चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ पर तू नहीं जानता।
The Supreme Lord said: Both you and I have had many births, O Arjun. You have forgotten them, while I remember them all, O Parantapa.
  - Chapter 4 - 
Shlok 4
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अर्जुन बोले आपका जन्म तो अभी का है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है अतः आपने ही सृष्टि के आदि में सूर्य से यह योग कहा था यह बात मैं कैसे समझूँ ?
Arjun said: You were born much after Vivasvan. How am I to understand that in the beginning you instructed this science to him?
  - Chapter 4 - 
Shlok 3
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तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है क्योंकि यह बड़ा उत्तम रहस्य है।
The same ancient knowledge of Yog, which is the supreme secret, I am today revealing unto you, because you are my friend as well as my devotee, who can understand this transcendental wisdom.