दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।56।।

duhkheshvanudvignamanaah sukheshu vigatasprhah. veetaraagabhayakrodhah sthitadheermuniruchyate।56।

दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता और सुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में स्पृहा नहीं होती तथा जो राग भय और क्रोध से सर्वथा रहित हो गया है वह मननशील मनुष्य स्थिरबुद्धि कहा जाता है।56।

स्वामी रामसुखदास जी

One whose mind remains undisturbed amidst misery, who does not crave for pleasure, and who is free from attachment, fear, and anger, is called a sage of steady wisdom.।56।

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Shrimad Bhagavad Gita

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।56।।

duhkheshvanudvignamanaah sukheshu vigatasprhah. veetaraagabhayakrodhah sthitadheermuniruchyate।56।

दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता और सुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में स्पृहा नहीं होती तथा जो राग भय और क्रोध से सर्वथा रहित हो गया है वह मननशील मनुष्य स्थिरबुद्धि कहा जाता है।56।

स्वामी रामसुखदास जी

One whose mind remains undisturbed amidst misery, who does not crave for pleasure, and who is free from attachment, fear, and anger, is called a sage of steady wisdom.।56।

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