4

. 8

कुग्रामवासः कुलहीनसेवा
कुभोजनं क्रोधमुखी च भार्या ।
पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या
विनाग्निना षट्प्रदहन्ति कायम् ॥

kugrāmavāsaḥ kulahīnasevā
kubhojanaṃ krodhamukhī ca bhāryā |
putraśca mūrkho vidhavā ca kanyā
vināgninā ṣaṭpradahanti kāyam ||

0
0

Residing in a small village devoid of proper living facilities, serving a person born of a low family, unwholesome food, a frowning without fire.

निम्नलिखित बाते व्यक्ति को बिना आग के ही जलाती है… १. एक छोटे गाव में बसना जहा रहने की सुविधाए उपलब्ध नहीं. २. एक ऐसे व्यक्ति के यहाँ नौकरी करना जो नीच कुल में पैदा हुआ है. ३. अस्वास्थय्वर्धक भोजन का सेवन करना. ४. जिसकी पत्नी हरदम गुस्से में होती है. ५. जिसको मुर्ख पुत्र है. ६. जिसकी पुत्री विधवा हो गयी है.

Share this Shlok
Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on whatsapp
Share on telegram

Trending Shloka

Latest Shloka in our Sangrah