प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः ।
सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः ॥

pralaye bhinnamaryādā bhavanti kila sāgarāḥ।
sāgarā bhedamicchanti pralaye’pi na sādhavaḥ॥

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जिस सागर को हम इतना गम्भीर समझते हैं, प्रलय आने पर वह भी अपनी मर्यादा भूल जाता है और किनारों को तोड़कर जल-थल एक कर देता है; परन्तु साधु अथवा श्रेठ व्यक्ति संकटों का पहाड़ टूटने पर भी श्रेठ मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करता।

At the time of the Pralaya (universal destruction) the oceans are to exceed their limits and seek to change, but a saintly man never changes.

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