प्रयाण काले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्‌- स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्‌।

Prayaanakaale manasaachalenaBhaktyaa yukto yogabalena chaiva;
Bhruvormadhye praanamaaveshya samyakSa tam param purusham upaiti divyam.

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वह भक्ति युक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है

At the time of death, with unshaken mind, endowed with devotion and by the power ofYoga, fixing the whole life-breath in the middle of the two eyebrows, he reaches that resplendentSupreme Person.

ମରଣକାଳେ ଏକାଗ୍ର ମନରେ ଯେ ଭକ୍ତିର ସହିତ ଭ୍ରୁଯୁଗଳମଧ୍ୟରେ ପ୍ରାଣକୁ ସୁଚାରୁରୂପେ ସ୍ଥାପନକରି ସ୍ମରଣ କରନ୍ତି ସେ ଦିବ୍ୟ ପରମ ପୁରୁଷଙ୍କୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଅନ୍ତି ।

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