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सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धय: |
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता: || 4||

sanniyamyendriyagraamam sarvatra samabuddhayah
te praapnuvanti maameva sarvabhutahite rataah.

भावार्थ : परन्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहने वाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं॥

Who imperishable, undefinable, unmanifest, worship, all pervading, unthinkable also unchanging, un-moving steady

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सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धय: |

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ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता: || 4||

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te praapnuvanti maameva sarvabhutahite rataah.

भावार्थ : परन्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहने वाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं॥
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