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यस्मिन्रुष्टे भयं नास्ति तुष्टे नैव धनागमः ।
निग्रहोऽनुग्रहो नास्ति स रुष्टः किं करिष्यति ॥

yasminruṣṭe bhayaṃ nāsti tuṣṭe naiva dhanāgamaḥ |
nigraho’nugraho nāsti sa ruṣṭaḥ kiṃ kariṣyati ||

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He who neither rouses fear by his anger, nor confers a favour when he is pleased can neither control nor protect. What can he do?

जिसके डाटने से सामने वाले के मन में डर नहीं पैदा होता और प्रसन्न होने के बाद जो सामने वाले को कुछ देता नहीं है. वो ना किसी की रक्षा कर सकता है ना किसी को नियंत्रित कर सकता है. ऐसा आदमी भला क्या कर सकता है.

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