परो अपि हितवान् बन्धुः बन्धुः अपि अहितः परः।
अहितः देहजः व्याधिः हितम् आरण्यं औषधम्।।

paro api hitavān bandhuḥ bandhuḥ api ahitaḥ paraḥ|
ahitaḥ dehajaḥ vyādhiḥ hitam āraṇyaṃ auṣadham||

यदि कोई अपरिचित व्यक्ति आपकी मदद करें तो उसको अपने परिवार के सदस्य की तरह ही महत्व दें और अपने परिवार का सदस्य ही आपको नुकसान देना शुरू हो जाये तो उसे महत्व देना बंद कर दें। ठीक उसी तरह जैसे शरीर के किसी अंग में कोई बीमार हो जाये तो वह हमें तकलीफ पहुंचती है। जबकि जंगल में उगी हुई औषधी हमारे लिए लाभकारी होती है।

Even an unknown person is like a friend to you if he is beneficial and helpful to you, whereas a friend who is hostile or harmful to you is like a stranger to you. Similarly an illness or a disease in your body is harmful whereas a herb found in a remote forest (which can cure you)is beneficial to you.

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Sanskrit Subhashitani

परो अपि हितवान् बन्धुः बन्धुः अपि अहितः परः।
अहितः देहजः व्याधिः हितम् आरण्यं औषधम्।।

paro api hitavān bandhuḥ bandhuḥ api ahitaḥ paraḥ|
ahitaḥ dehajaḥ vyādhiḥ hitam āraṇyaṃ auṣadham||

यदि कोई अपरिचित व्यक्ति आपकी मदद करें तो उसको अपने परिवार के सदस्य की तरह ही महत्व दें और अपने परिवार का सदस्य ही आपको नुकसान देना शुरू हो जाये तो उसे महत्व देना बंद कर दें। ठीक उसी तरह जैसे शरीर के किसी अंग में कोई बीमार हो जाये तो वह हमें तकलीफ पहुंचती है। जबकि जंगल में उगी हुई औषधी हमारे लिए लाभकारी होती है।
Even an unknown person is like a friend to you if he is beneficial and helpful to you, whereas a friend who is hostile or harmful to you is like a stranger to you. Similarly an illness or a disease in your body is harmful whereas a herb found in a remote forest (which can cure you)is beneficial to you.

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